साहिल
हिन्द-युग्म विगत सोमवार को यूनिकवयित्री किरणबाला की कविता प्रकाशित नहीं कर सका। श्रीकांत मिश्र 'कांत' जी ने यूनिकवयित्री से संर्पक साधने का भरसक प्रयत्न किया था, लेकिन सफल नहीं हो सके थे। लेकिन खुशी की बात यह है कि मार्च माह के आखिरी सोमवार को हम यूनिकवयित्री की कविता लेकर हाज़िर हैं।
साहिल
साहिल से चली हूँ
साहिल तक जाना है
ओ ! मेरे साहिल ज़रा
तू और आगे चला जा
क्योंकि .. तेरे लिये
चलने में बहुत मज़ा है
ओ ! कांटो ज़रा और
नुकीले हो जाओ
क्योंकि तुम्हारी चुभन
मेरे पांवों को
महसूस नहीं हो रही
ओ ! तूफां
ज़रा और ज़ोर से टकरा
क्योंकि .. तुझसे
टकराने में बहुत मज़ा है
ओ ! नदी
ज़रा और तेज़ी से बह
क्योंकि .. तेरी
धारा के विपरीत चलने में
मुझे बहुत मज़ा है
ओ! पहाड़ो
ज़रा और ऊँचे हो जाओ
ओ जंगलो
जरा और घने हो जाओ
क्योंकि तुम्हारे ..
उस पार जाने में बहुत मज़ा है
ओ ! ज़िदगी
तू क्या लूटेगी मुझे
मुझे तो ख़ुद लुटा जाना है
क्योंकि साहिल से चली हूँ
उसे पहचानना है
उस पर मिट जाना है
साहिल तक जाना है
किरणबाला









































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13 पाठकों का कहना है :
किरण जी बधाई
पहले से बेहतर
और साधारण कविता
साहिल से चली हूँ
साहिल तक जाना है
ओ ! मेरे साहिल ज़रा
तू और आगे चला जा
क्योंकि .. तेरे लिये
चलने में बहुत मज़ा है
" अच्छी रचना"
किरन जी,
कविता का शब्दावेश कविता के शीर्शकानुसार नहीं मिल पा रहा है.. थोडा और प्रयत्न किया जाये..
ढेरों शुभकामनायें..
ओ ! ज़िदगी
तू क्या लूटेगी मुझे
मुझे तो ख़ुद लुटा जाना है
क्योंकि साहिल से चली हूँ
उसे पहचानना है
उस पर मिट जाना है
साहिल तक जाना है
किरणबाला जी, कविता का प्रवाह और अंत दोनों ही सराहनीय है। बेहतरीन रचना..
*** राजीव रंजन प्रसाद
बहुत खूब
हाँ अब लौटी हैं आप रंग में, सुंदर कविता है.... प्रवाह है नदी की तरह ही....
Bahut achche. bhav khoobsurat hain..
किरण जी
साफ झलकता है साहिल से बहुत गहरा रिश्ता है आपका . कविता तो एक बहाना सा लगता है ... बधाई एक अच्छी कविता के लिए ...
किरण जी
साफ झलकता है साहिल से बहुत गहरा रिश्ता है आपका . कविता तो एक बहाना सा लगता है ... बधाई एक अच्छी कविता के लिए ...
ओ ! कांटो ज़रा और
नुकीले हो जाओ
क्योंकि तुम्हारी चुभन
मेरे पांवों को
महसूस नहीं हो रही
-अच्छा लिखा है.
सुंदर रचना !
कवयित्री की उद्दाम जीजिविषा और विसम परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाने का संदेश निश्चय ही प्रशंसनीय है ! लघु निर्बंध छंद और सहज शब्द कविता की दूसरी प्रमुख विशेषताएँ हैं !
किरन बाला जी
बहुत ही सुंदर कविता लिखी है आपने-
ओ ! ज़िदगी
तू क्या लूटेगी मुझे
मुझे तो ख़ुद लुटा जाना है
क्योंकि साहिल से चली हूँ
उसे पहचानना है
उस पर मिट जाना है
साहिल तक जाना है
badhayi
सुन्दर रचना।
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