Tuesday, May 20, 2008

केंचुल छोड़ता साँप

दीन-दुनिया के
तमाम तहसीलदार
चाँद के महलों में
नहीं रहते,
कुछेक के लिए
हरे-भरे दरख्तों
के नशेमन हीं
काफी होते हैं;
पर सुना है कि
दरख्त
चाँद तक जाने लगे हैं अब!

कहते हैं-
पानी के बुत
पिघलना नहीं जानते
बस उबलना जानते है।
ये बुत
कभी-कभार
कर आते हैं
पथरीली कंदराओं की सैर
तो कभी
मंदिर और संग्रहालयों के दरवाजों
पर जोर-आजमाईश भी करते हैं,
तभी शायद
जनमता है इनमें
पृष्ठ-तनाव का बोध-
तन जाते हैं ये,
और फिर
इतिहास के हर पृष्ठ पर
इनकी
लकवा-ग्रस्त तस्वीरें उभर आती हैं।

ऎसे हीं कुछ पनियल बुत
या कहिये
दुनिया के
तथाकथित तहसीलदार
हर चार या आठ घंटे पर
आसमान पर अपना अक्स देखते हैं
और भगवान होने का
शौक पालने लगते हैं,
हर चार या आठ दिन में
अकारण हीं
हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की बातें करते हैं
तो कभी
कुत्तों की भांति
अपने "महान""राष्ट्र" की हेंकरी भरते हैं
और
देश के दूसरे बिजली के खंभों पर
टाँगे ऊँची कर देते हैं,
हर चार या आठ महिने में
"मोगरे" के फूलों पर
"कनैल" के टैग डालते होते हैं,
"ब" को "मु" करने से पेट नहीं भरता तो
अरब सागर की हवाओं से लेकर
स्कूल और स्टाक एक्सेंज तक
किसी मुम्बा देवी की पैरवी करते हैं।
ऎसे पनियल बुत
पिघलते नहीं
वरन
कभी अनजाने में
किसी की अंगीठी में उलझकर
उबल जाते हैं।

अंगीठी
या फिर
एक अगरबत्ती बस
उसी की होती हैं
जो जानता है कि
केंचुल छोड़ता साँप
मौसम की पगडंडियों से गुजरकर
जब भी
हमारे मगज़ में जा बैठता है,
जिंदगी महज़ खानापूर्त्ति नहीं करती,
ना हीं
खानाखराब होने का डर होता है हमें,
हम बस
नाक की सीध में
मौत के गुर्गे छान मारते हैं,
और फिर
बिना किसी जाँच-पड़ताल के
मौत को मौत की नींद सुला देते हैं;
यूँ
सुलग उठता है केंचुल
और निगल लेता है साँप का कफन।

आज फिर
एक हीं के
कई सारे
रूप सामने हैं हमारे-
पनियल बुत,
तथाकथित तहसीलदार,
केंचुल छोड़ता साँप।
सबके लिए काफी है
बस एक पत्थर
या फिर एक पत्थर-दिल
जो जानता हो पिघलना
पर उबलता न हो.................।

-विश्व दीपक ’तन्हा’


Monday, May 19, 2008

आसमां कैसे कैसे ?

सिर्फ ज़मीं ही नहीं
हर गांव-शहर के ऊपर फैले
आसमां का रंग भी जुदा होता है

मेरे गांव वाल घर की छत से
काली रात में टिमटिमाते तारों की तुलना में..
जहां मैं पला-बढ़ा
उस शहर के आसमां पर
वैसी ही काली रात को (!!)
कम तारे टिमटिमाते नज़र आते थे

और इस महानगर की...
जहां मैं रोजी-रोटी की तलाश में आया हूं..
कल की रात तो
मेरे लिए खौफनाक थी
एक भी तारा नहीं दिखा!!!

आसमां पूरी रात
अजीब रंग से ढँका लगा
वो रंग...बादल....नहीं
धूल भी नहीं.....
रौशनी....पता नहीं
लेकिन मैं सहमा हुआ हूं...

दादी कहती थी कि
वो मर कर तारा बन जाएंगी
बुआ बताती थी कि
आदमी मर कर तारा बन जाता है
पिताजी ने भी मरने से पहले
भरोसा दिया था कि
वो मुझे ऊपर से देखा करेंगे

मां तो...अब भी ऐसा ही कुछ कहती हैं

तो क्या..इस शहर (महानगर!!) में
कल रात के आसमां से..
किसी के अपने ने...
...अपनों को देखने की
जहमत नहीं उठाई!!!

तो क्या....
इस अनजान शहर (महानगर!!) में
मैं बिल्कुल अकेला हूं?


दिल्ली तो अपना ही घर है

आलोक सिंह 'साहिल', अल्पना वर्मा, गीता पंडित, महक, सीमा गुप्ता, सीमा सचदेव, पूजा अनिल आदि हिन्द-युग्म मंच के ऐसे नाम हैं जिनकी पठनियता के समक्ष हर कोई नतमस्तक हो जायेगा। आज यूनिकवि प्रतियोगिता के अप्रैल अंक से ऐसे ही एक पाठक-कवि आलोक सिंह साहिल की कविता लेकर हम उपस्थित हैं। इनकी कविता आठवें स्थान पर है। आलोक सिंह साहिल को और जानें

पुरस्कृत कविता- अपना घर

दिल्ली की सड़कों पर,
सहज ही दिख जाते,
आवारा कुत्ते और सांड
तो लगता है
दिल्ली तो अपना ही घर है.
खाते वक्त जब,
अटकने लगे निवाला,
तो दिख जाते,
किसी की हाथों में
वो पानी की कुछ लड़ियाँ.
यहाँ भी रौंदते है,
गाड़ियों के पहिए
सुनसान सड़क को,
स्याह रात में, जैसे
इफ्तार के वक्त सिगरेट की कश
दौड़ती है
खाली सुखी नसों में
तो लगता है
दिल्ली तो अपना ही घर है.
दिख जाते यहाँ भी
कभी कुछ हाथ, उठाने को
जब विरले अनजाने में
हो जाए
धरती का आलिंगन.
यहाँ भी मिलते
हर कदम पर
बंदिश रहित शौचालय.
दिख जाते
यहाँ सहज ही
कंक्रीट, कोलतार के बने
चमकते थूकदान
हर सफर में,
तो लगता है
दिल्ली तो अपना ही घर है.
यहाँ भी माएं जाती
बच्चों को
स्कूल बसों तक छोड़ने
हाथ में लटकाए टिफिन बॉक्स,
यहाँ भी जलती
प्रेमी-युगलों की
असमय लाशें,
यहाँ भी होते
वृहद् धर्मायोजन,
रहते यहाँ भी
भूखे-नंगे
फटे-चिथड़ों में,
तो लगता है
दिल्ली तो अपना ही घर है
मिलते यहाँ भी
भिखमंगों को चिल्लर,
दिख जाते यहाँ भी
वर्दीधारी रंगदार,
बलात्कारी ठेकेदार,
जब शोषित होते
सहमी गलियों से
निकलने वाली पैदावार
और जब घुटती
उनकी साँसे, उनके घरों में
तो लगता है
दिल्ली तो अपना ही घर है.



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ६॰९, ६॰८, ५॰५
औसत अंक- ५॰८
स्थान- आठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३, ४॰५, ४॰५, ५॰८ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰४५
स्थान- आठवाँ


पुरस्कार- डॉ॰ रमा द्विवेदी की ओर से उनके काव्य-संग्रह 'दे दो आकाश' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।


राम भक्तों का बहुत होने लगा 'ड्रामा' यहाँ

६३ वर्षीय प्रेमचंद सहजवाला गद्य लेखन को पीछे छोड़ते हुए आजकल ग़ज़ल से प्रेम कर बैठे हैं और इस नाते हिन्द-युग्म के पाठकों का प्रेम भी पा रहे हैं। आज हम ईनामी कविता के रूप में इस माह प्रकाशित इनकी तीसरी ग़ज़ल लेकर आये हैं (प्रत्येक ग़ज़ल रु १०० के हिसाब से नकद ईनाम भी जीत रहे हैं)।

ग़ज़ल

छोटी छोटी बात पे होता है हंगामा यहाँ
चाहे कुर्ता तंग या छोटा हो पाजामा यहाँ

खौफ का माहौल है अब नींद कैसे आएगी
रोज़ सपनों में खड़ा रहता है ओसामा यहाँ

इस जग्ह मन्दिर बने और उस जग्ह सेतु रहे
राम भक्तों का बहुत होने लगा 'ड्रामा' यहाँ

लाठियों के ज़ोर पर ही हम विचरते मुल्क में
सभ्यता को हम ने ही कांधों पे है थामा यहाँ

हथकडी में तूलिका ले कर बनाओ चित्र सब
चित्रकारों से कहो लिक्खें हलफनामा यहाँ

भूख से भी है बड़ा ऐ दोस्त वंदे मातरम्
यह बताने के लिए आया हुक्मनामा यहाँ

आज पंचों ने दिया है गोत्र पर ये फ़ैसला
बाप ही कहलायेगा बेटे का अब मामा यहाँ

जल गयी मजबूर सी वह प्यार कर के भूल से
किस कदर बेबस हुई हर गांव की वामा यहाँ

-प्रेमचंद सहजवाला


Sunday, May 18, 2008

भारतीय बनें

जब भूकंप ने उत्पात मचाया था ,
सामुद्रिक तूफ़ान ने तबाही मचाई थी ,
सुनामी ने कहर बरसाया था ,
तबाही के इस मंजर में
किसी ने यह न पूछा था
तेरा धर्म क्या है

उमड़ पड़ा था भारत सहायता के लिए
जिनका सम्बन्ध ह्रदय से रहा, बुद्धि से नहीं
भावना से रहा, तर्क से नहीं
भारतीयता का परिचय देकर
उसने मानवता का संदेश दिया
दया,सेवा,कर्तव्य को धर्म बतलाया .......

कभी मुसलमान बनकर
अमरनाथ - यात्रा में फँसे हिन्दुओं को बचाया था ,
कभी दंगों के समय मुसलमान को शरण दिया था ,
कभी एक होकर दुश्मनों को भगाया भी था
वह आज ......?

चाहकर भी स्वार्थी , कट्टर नेता के
धर्म को न बदल पाया
जो स्वार्थ सिद्धि के लिए
खून की होलियाँ रचते हैं ,
भाषा व प्रांत के नाम पर लाठियाँ बरसाते हैं ,
भाई को भाई से लड़ाते हैं,
अखंडता को लहुलुहान करते हैं ,
एकता पर चोट पहुंचाते हैं ......

विनती है 'भारत' का
भारत में भारतीय बनें ,
भावात्मक एकता को बनाए रखें ,
प्रेम , अहिंसा के मार्ग पर बढ़कर
विश्व शान्ति के लिए मंगल कामना करें
विश्व शान्ति के लिए मंगल कामना करें ....

सुनीता यादव