Saturday, May 17, 2008

मंजिलें बुनियाद के बिन भी कभी टिकती नहीं

सातवें स्थान के कवि अक्षय शर्मा पहली बार शीर्ष १० में अपनी जगह बना पाये हैं। अक्षय कुमार शर्मा अलीगढ़ के पास के एक क़स्बा गवाँ, जिला बदायूं के निवासी हैं। ये सनोफी-अवेंतिस फार्मा कम्पनी में प्रतिनिधि के तौर पर कार्यरत हैं। कविता लिखना इनका शौक है और इस अपनी जिंदगी में एक नयापन महसूस करते हैं। ये हिन्द-युग्म के आभारी हैं जिसने हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन के लिए एक सशक्त माध्यम का निर्माण किया है। साथ ही इनका यह प्रयास रहेगा कि ये हिंद युग्म के माध्यम से अपनी कविताओं को आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर सकें।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

हर सुबह हर शाम से सीखो तो सीखो ये सबक
जिन्दगी बिन चाँद और सूरज के भी रुकती नहीं

गर कोई झुकता है आज तुच्छ न समझो उसे
फूल और फल के बिना एक शाख भी झुकती नहीं

नींव के पत्थर को मत समझो कि वो है दब गया
मंजिलें बुनियाद के बिन भी कभी टिकती नहीं

हारता है जो जहाँ में समझो मत हारा उसे
हार के बिन जीत की रौनक कभी दिखती नहीं



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६, ६, ५॰२, ६॰५
औसत अंक- ५॰९२५
स्थान- छठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ५, ४, ५॰९२५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰७३१२५
स्थान- सातवाँ


पुरस्कार- डॉ॰ रमा द्विवेदी की ओर से उनके काव्य-संग्रह 'दे दो आकाश' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।


Friday, May 16, 2008

रेलवे क्रासिंग बंद है, इसलिए प्रतीक्षा है

यह लगातार दूसरी बार है कि हम हिन्द-युग्म की यूनकवि प्रतियोगिता से वाराणसी निवासी देवेन्द्र कुमार पाण्डेय की कविता प्रकाशित कर रहे हैं। इनकी पहली ईनामी कविता 'मुट्टी भर धूप' को पाठकों ने काफी पसंद किया था। पिछली बार किन्हीं कारणों से ये अपना चित्र नहीं भेज पाये थे, इस बार इनका चित्र हमें प्राप्त हो गया है।

पुरस्कृत कविता- प्रतीक्षा

जीवन के रास्ते में कई मुकाम हैं।
जैसे-
एक नदी है
नदी पर पुल है
पुल से पहले
सड़क की दोनों पटिरयों पर
कूड़े के ढेर हैं
दुर्गंध है
पुल के उस पार
रेलवे क्रासिंग बंद है।
क्रासिंग के दोनों ओर भीड़ है
भी़ड़ के चेहरे हैं
चेहरे पर अलग-अलग भाव हैं
अपने-अपने घाव हैं
अपनी-अपनी मंजिल है।
सब में एक समानता है
सबको मंजिल तक जाने की जल्दी है
लम्बी प्रतीक्षा-एक विवशता है।
ट्रेन की एक सीटी पर-
सबके चेहरे खिल जाते हैं।
ट्रेन की सीटी-
आगे बढ़ने का एक अवसर है
अवसर-
चींटी की चाल से चलती एक लम्बी मालगाड़ी है।
चेहरे बुझ जाते हैं।
प्रतीक्षा में-
एक हताशा है
निराशा है
गहरी बेचैनी है।
प्रतीक्षा-
कोई करना नहीं चाहता
ट्रेन के गुजर जाने की भी नहीं।
मंजिल है कि आसानी से नहीं मिलती।
जीवन एक रास्ता है जिसमें कई नदियाँ हैं
मगर अच्छी बात यह है
कि नाव है और नदियों पर पुल भी बने हैं।
रेलवे क्रासिंग बंद है
मगर अच्छी बात यह है कि
ट्रेन के गुजर जाने के बाद खुल जाती है।
कमी तो हमारे में है
कि हम
चींटी की चाल से चलती
एक लम्बी मालगाड़ी के गुजरने की
प्रतीक्षा भी नहीं करना चाहते।



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५॰५, ६॰६५, ५, ४॰३
औसत अंक- ५॰३६२५
स्थान- सोलहवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ६, ४, ५॰३६२५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰८४०६२५
स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- डॉ॰ रमा द्विवेदी की ओर से उनके काव्य-संग्रह 'दे दो आकाश' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।


बाबरी

प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा

एक धरोहर खड़ी हुई मिथ्या की नीव पर
जिसके नीचे
शवदाह में दबी अस्थियां
इतिहासकारों की परिकल्पना को सहलाती रही
जो जीवित होना चाहते थे
नासमझी पर रोना चाहते थे
ऐसे चमकीले दांत और अस्थियों के अवशेष
जिन्हें फूंक मार कर जिन्दा करने को
लालायित थे तांत्रिक
पर क्रुद्ध मौत के समक्ष जीवन की हार
हुई सिर फुटौवल
खुद ही घंटी बजाता खतरे का निशान
हत्या हुई बलिदान
लो फिर एक कुनामी
बन कर आई सुनामी ।

-हरिहर झा


Thursday, May 15, 2008

'पहली कविता' का दूसरा दस्ता






काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-2)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - मई 2008






कवि की पहली कविता का प्रकाशित होना जैसे उसकी लेखनी के इतिहास पर से पर्दा उठना। कितना सुखद है कि हिन्द-युग्म के इस आयोजन ने कविताई डायरियों के पहले पन्नों से धूल हटा दी है! इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज हम काव्य-पल्लवन के 'पहली कविता' विशेषांक का दूसरा अंक प्रकाशित कर रहे हैं, मगर अभी ही हमारे पास तीसरे अंक के लिए २० कविताएँ तैयार हैं। इसके पहले अंक पर आईं प्रतिक्रियाओं से हमारी पूरी टीम का मनोबल बढ़ गया है। हमारी यही कोशिश है कि हम सभी नये-पुराने कवियों को इस मंच पर ला पायें।

पहले भाग की तरह इस भाग के लिए www.hindyugm.com का हेडर पीयूष पण्डया ने और http://merekavimitra.blogspot.com का डेहर प्रशेन क्यावाल ने बनाया है।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| सविता दत्ता | शोभा महेन्द्रू | देवेन्द्र कुमार मिश्रा | महक | डॉ॰ शीला सिंह |गोविंद शर्मा | रश्मि सिंह | अभिषेक पाटनी | अवनीश तिवारी | विजयशंकर चतुर्वेदी | आदित्य प्रताप सिंह |
| डा. आशुतोष शुक्ला | अमित अरुण साहू | रेनू जैन | सुरिन्दर रत्ती | मंजू भटनागर | शिवानी सिंह | श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' | अमिता 'नीर' | कु० स्मिता पाण्डेय


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





सज़ा भी जरूरी है

सज़ा भी ज़रूरी है
ज़िन्दगी इस के बिना अधूरी है
ज़िन्दगी को पूरा जीना है अगर
तो मत कह मालिक से
कि मेरी सज़ा माफ़ कर
क्यूकि इसके बिना जीने का
तुज़ुर्बा हासिल ना कर पाएगा
जब कुछ सीखेगा नहीं तो
किसी को क्या सिखलाएगा?

--सविता दत्ता





जन्मदिन पर…….
यह १९७७ में कक्षा में बैठ के लिखी थी जब मेरी सहेली ममता के भाई का जन्मदिन था ।

सुनहले उजालों ने ने चिलमन फैलाया
किरण जाल पहने अमिताभ आया
अँधेरों ने घबरा के चादर उठाई
मधु डाले शब्दों में शहनाई गाई
ये ज़र और ज़मीं भी ज़रा मुसकुराई
मैं दामन सँभाले थी हँगना में आई

हवाओं से पूछा, घटाओं से पूछा
खुशी किसलिए है, है कैसी ये पूजा
ऐ कलियों बताओ, तुम्ही कुछ सुझाओ
मेरे सारे संशय तुम्ही अब मिटाओ
बताओ भला क्यूँ ये सुर सज रहे हैं
बहारों के मेले ये क्यूँ सज रहे हैं

क्यों रौनक बढ़ाती है भँवरों की गुँजन
घटाएँ लगाती हैं किसको यूँ अंजन

कहीं से उमड़ एक बादल आ छाया
कौतूहल को मेरे था उसने मिटाया
वो इठलाया पहले ज़रा मुसकुराया
मेरे पास आकर के फिर गुनगुनाया
जन्मदिन तुम्हारे ही प्यारे का आया

--शोभा महेन्द्रू





हरित क्राँति
कृषि प्रधान देश है अपना,
मेरा देश महान ।
सरकारें हैं आती- जाती,
नहीं किसी को ध्यान ।।
हरित क्राँति सत्-सत् प्रणाम ।

खून-पसीना सीच-सीच कर ,
देता जीवन दान ।
रूखी-सूखी रोटी खाकर,
पैदा करता धान्य ।।
दिन-रात करे तू काम ।
हरित क्राँति सत्-सत् प्रणाम ।

ऊबड-खाबड पडी धरा को,
तू उपजाऊ बनाये ।
कुंआ खोद, मेहनत करके ,
भगीरथी बहाये ।।
सुबह से लेकर शाम ।
हरित क्राँति------------------

उत्तम कोटी बीज डालकर,
चला रहा है हल ।
ऊर्वरा शक्ति बढाने
खाद डालता पल-पल ।।
कीट नाशकों का अन्जाम ।
हरित क्राँति------------------

बच्चों सा करते संरक्षण,
अच्छी फसल उगाते ।
कली से बनता फूल,
फूल से फल बन जाते ।।
आशा है, फसलें भरें गोदाम ।
हरित क्राँति------------------

कभी है पडते ओले, सूखा,
कभी बरसता भारी पानी ।
साहूकारों व बैंकों से
लेकर कर्जा करें किसानी ।।
जीना हुआ हराम ।
हरित क्राँति------------------

व्याज देते-देते,
वक्त बीतता जाता ।
मूल चुका नहीं पाते,
खेत-मकान सभी बिक जाता ।।
होता बुरा अन्जाम ।
हरित क्राँति------------------

जागो कृषक जवानो,
नूतन जन चेतना जगाओ ।
तिरंगे के हरे रंग की लाज,
आप के हाथ इसे बचाओ ।।
आश लगाये देख रहा आवाम ।
हरित क्राँति------------------

कृषक नीति में कर संशोधन ,
उध्योग का दर्जा दिलाना ।
विदेशी अन्न की नहीं जरूरत ,
स्वदेशी अन्न उगाना ।।
फिर आये नीचट परिणाम ।
हरित क्राँति------------------

--देवेन्द्र कुमार मिश्रा





महक
ना कोई छू पाए
ना कोई कर सके दीदार
फूलों में मेरा बसेरा
और ज़िंदगी से मुझे प्यार
बन गई तेरी दीवानी
इस का भी इज़हार
हवा संग उड़ जाउँ बन तितली
और बिखेरू खुशबू
यही मेरा काम
महसुस करो न मुझे
महक मेरा नाम |

--महक





मैने पहली बार मौत को इतने करीब से देखा था,वह मेरा छोटा भाई था मै उस मोड़ पर थी जहा से सपनो को पंख मिलते हैं, मेरे घर मे खा़मोशी ने अपना घर बना लिया था,और तभी मैने पहली बार यह पंक्तिया लिखी थी.मैने बहुत कुछ लिखा पर कभी सहेजा नहीं पर यह आज भी म्रेरे साथ है.यह कविता 1967 मे लिखी थी मैने इतना समय बीत गया पर लगता है कि आज की बात है शायद वह वापस भी आ गया हो और आपके ही बीच हो.
मौत-भाव

शयन का भाव तुम्हारा
भोला कितना सुकुमार कितना
निमिलित पलकों में नीरवता कितनी
सटे हुये इन होटों पर लाली है कितनी
बेख़बर तुम्हारे सोने का यह भाव
कितना प्यारा कितना सुन्दर
कैसे अचानक सो गये ?
काश तुम्हारी आखों मे
जीवन का स्पन्दन
उर का अभिनन्दन
और जीवन की ह्सी
इन स्वपानिल उनीदीं आखो मे होती
पर मौत की खुमारी न होती

--डॉ॰ शीला सिंह






मातृभाषा
ऐ मेरे देशभक्त
मुझे कराया आजाद,
तुमने बहाकर अपना अनमोल रक्त।
पर तुम मुझे नहीं पहचानते
मेरे महत्व को नहीं जानते।
अरे!पहचानोगे कैसे?
लहुलुहान कर दी मेरी भाषा
तुमने तो बंद कर दिये मेरे भाब्द,
मेरी आत्मा को कर दिया है क्षुब्ध।
क्या बोलते हो तुम,
मेरी समझ में नहीं आता
फिरंगी इस अंग्रेज़ी का
गान मेरे मन को नहीं भाता।
अरे! इनको देखो,
परदेश में भी बोलते हैं मातृभाषा,
और तुम्हें देखो
अपने ही देश में नहीं हिन्दी का ज्ञाता,
अपने देश में ही रहकर,
कोई अपनी मातृभाषा नहीं चाहता।
तुमने मुझे कराया स्वतंत्र
किन्तु मुझे तो लगता है
मैं अभी भी हूँ परतंत्र।
इस फिरंगी भाषा ने मुझे
अपने कारावास में रखा है बंद,
इस बन्धगी से उर मेरा करता है क्रंदन।
और पूछता है उन आजादी के परवानों से,
कब तोड़ोगे मेरा यह बंधन।
अविचल हो जाता है मेरा मन,
अकुलाहट सी होती है
पर फूटी है मेरी किस्मत।
यह जुबान कुच नहीं बोलती है
बोलते हो जब तुम यह वाणी
मन में अकुलाहट सी होती है।
और ऐसा लगता है मानो
एक माता अपने पुत्र को जानते हुए भी
उसके हृदय की वाणी नहीं जानती है।
तुम तो घूमते हो स्वतंत्र
पर मैं अब भी हूँ परतंत्र।
हे मेरे प्यारे पुत्रों,
इस परतंत्रता को कर दो परास्त,
एक दुखी माँ की बढ़ा दो आस
अपनी इस प्यारी माँ को,
जरा सुना दो मेरी अपनी भाष।
उस दिन आजाद होगी मेरी आत्मा
अपनालोगे पूर्ण रूप से जब तुम मातृभाषा।

--गोविंद शर्मा






सूरज का ढलना

सूरज का ढलना रोज छत पर बैठ देखती हूँ
सूरज का ढलना अहसास तक ना हो इतना धीरे धीरे होता है
उसका रंग बदलना पहले सुनहला,
फिर चंपई और अन्त मे लाल हो जाना कानो से टकराकर गूंजती रहती है
घोसलों की ओर लौट रहे चिडियों की कलरव ध्वनि धयान खिचती रहती है
खेलते बच्चों की आवाजें उस वक्त सुरज नही बरसाता है अग्नि हवा पलटती रहती है
बगल में रखी किताबो के पन्ने वो आहिस्ते आहिस्ते बताती है
हमें समय नहीं किसी के बस मे धीरे धीरे सूरज डूब जाता है
बासं के झुरमुटों के बीच में वो आमों की डालियों के बीच छुप जाता है
क्षितिज पर रह जाती है बस उसकी लालिमा वो भी कुछ क्षण में लुप्त हो जाती है
मालूम नहीं वो जाता है कहाँ किस आकाश में किससे मिलन की प्यास में एक हवा का झोंका ही ये अहसास दिलाती है
जो डूब गया वो दुबारा फिर कभी नही आएगा
तेरे जीवन में जो आएगा वो होगा कल एक नया सवेरा डूबा हुआ नयेपन के अहसास में !

--रश्मि सिंह







आपने पहली कविता जब से मांगी है....मेरे अंदर एक तरह का कोहराम मचा हुआ है....मुझे वाकई नहीं पता कि पहली कविता मैंने कब..क्या और किन पिरिस्थितयों में लिखी...बस ईमानदारी इतनी बरती है कि..१९९६ में...जब मैंने अपनी कविता कलेक्शन शुरु किया...उस वक्त की पहली डायरी की.... मेरी पहली कविता को अपनी पहली रचना मान कर आपको नज़र कर रहा हूं.

माँ

तुम में निहित हमारी ज़िन्दगी है, माँ
तुम हमारी धरती भी हो, संसार भी
हर धूप से बचे हैं तेरी छांव में
तेरी हर भावनाओं से हमें पहचान है
आंसू भी देखें हैं तेरे मुस्कान भी
और सिमटे हुए तेरे अरमान भी
तुमसे उठे हैं....नित तुम पे ही झुके हम
ऐसा हमें आशीर्वाद दो! वरदान दो!

--अभिषेक पाटनी





कमल

वह है कमल,
उसके तन पर लगा धूल,
पर वो गया उसे भूल,
उसका विश्वास है अटल,
वह है कमल |
पानी मे करता प्लवन,
दूर देश की करता भ्रमण ,
नही है यह जटल,
वह है कमल |
रहो सदा तन - मन से श्वेत ,
देता है यह संदेश,
नही करता किसी की नक़ल,
वह है कमल |

-- अवनीश तिवारी
फरवरी १९९५





बीड़ी सुलगाते पिता


खेत नहीं थी पिता की छाती
फिर भी उसमें थी एक साबुत दरार
बिलकुल खेत की .तरह.

पिता की आँखें देखना चाहती थीं हरियाली
सावन नहीं था घर के आस-पास
पिता होना चाहते थे पुजारी
खाली नहीं था दुनिया का कोई मन्दिर
पिता ने लेना चाहा संन्यास
घर नहीं था जंगल.

अब पिता को नहीं आती याद कोई कहानी
रहते चुप अपनी दुनिया में
पक गए उनकी छाती के बाल
देखता हूँ....
पिता की निगाहें ढूँढती रहती हैं मेरी छाती में कुछ.

पिता ने नहीं किया कोई यज्ञ
पिता नहीं थे चक्रवर्ती
कोई घोड़ा भी नहीं था उनके पास
वह काटते रहे सफ़र
हांफते-खखारते फूंकते बीड़ी
दाबे छाती एक हाथ से
लुढ़काते रहे खड़खड़िया साइकल.

पिता ने नहीं की किसी की चिरौरी
तिनके के सहारे के लिए नहीं बढ़ाया हाथ
हमारी दुनिया में सबसे ताकतवर थे पिता
वह नंधे रहे जिंदगी के जुये में
मगर टूटे नहीं
बल्कि दबते गए धरती के बहुत-बहुत भीतर
कोयला हो गए पिता.

कठिन दिनों में
जब-जब जरूरत होगी हमें आग की
हम खोज निकालेंगे बीड़ी सुलगाते पिता.

(२१ सितम्बर, १९९२)

--विजयशंकर चतुर्वेदी





चाहत है तो आइये,
शिकवा है तो जाइये
ज़िन्दगी तो चलती रहेगी,
रिश्ते बनते बिगड़ते रहेंगे
पर भी हो सके तो हाथ से हाथ मिलाइये
चाहत है तो आइये...

--आदित्य प्रताप सिंह





खुद खूब सोच लो अभी इल्ज़ाम से पहले,
क़ातिल नहीं हो सकते कभी मेंहदी रचे हाथ।
वो पहली बार हमसे छुपा रहे थे कोई शै,
किए हाथ सामने तो दिखे मेंहदी रचे हाथ।
लो ख़ुद ही देख लो यहां तुम अपने प्यार को,
मुझको दिखा के कह गये वो मेंहदी रचे हाथ।
मेरे प्यार की हिना तो खूब रंग लाई है,
एहसास हुआ देख के वो मेंहदी रचे हाथ।
हम कब से थे बेताब उसी प्यारी झलक के
मुझको वहां तक ले गये वो वो मेंहदी रचे हाथ।
आपस में लड़ने वालों ज़रा तुम भी देख लो,
हैं प्यार की बरसात से वो मेंहदी रचे हाथ।

--डा. आशुतोष शुक्ला





मेरी पहली कविता मैंने कुछ लाइने पढ़कर लिखी थी. तब मैं कक्षा ६ वी में था . पहला प्रयास था, तो भेजने मे बड़ी हिचकिचाहट महसूस हो रही है. लेकिन ईमानदारी का तकाजा है, तो सचमुच मैं अपनी पहली कविता भेज रहा हूँ. स्वीकार करें.
क्या खता हमसे हमसे हुई
जो ख़त का आना बंद है
आप ही नाराज है या डाकखाना बंद है
डाकखाना बंद हो तो कोई बात नहीं
पर, आप हमसे नाराज हो तो ,
हमारे पास आपको खुश करने का प्रबंध है
जब से हुआ है तेरे ख़त का आना यूँ बंद
जानेमन मेरे दिल-ऐ-दर्द का अंत नहीं है
तेरे ख़त के इंतजार मे बीत जाता है दिन
और, तन्हाई मे मेरी रात गुजरती है
जानेमन तुम हमपर तरस थोड़ा खाओ
खुदा के लिए हमारी खता को भुलाओ
लिखों हमे तुम ख़त और खता माफ़ करों
यही हमारे दर्दे दिल की दवा है , और
यही हमारे दिल के दर्द का अंत है .

--अमित अरुण साहू




पहली कविता ! आपने सच कहा - मानो किसी का पहला प्रेम। मेरी डायरी में तारीख है ११ फरवरी १९९३, मगर आज भी यह कविता उतनी ही प्रिय है जितनी पहले दिन लगी थी।

याद है मुझको जब मैंने
हिंदी को माता माना था,
हिन्दी में बातें करते लगता,
कोई पुराना नाता था।
जब पहली बार गिरा था मैं,
माँ कहकर ही चिल्लाया था,
जलती रोटी छोड़ तवे पर
माँ ने गले लगाया था।
बाबा जब शाम को आते थे,
मैं गोदी में चढ़ जाता था,
निकाल जेब से मीठी गोली
बड़े मजे से खाता था।
हाथी को हाथी कहते थे,
घोडा घोडा ही होता था,
दिल की बातें करने मैं
ज़रा न आलस होता था।
फिर इक दिन घर आयी सहेली,
नाम था जिसका अंग्रेज़ी,
मात-पिता को ऐसी भाई
सारी दुनिया ही बदल गयी।
सब से पहली छूटी मैया,
अब तो मेरी मम्मी है,
जो ठंडा खाना मेज़ पे रखकर
किट्टी क्लब को जाती है।
जब रात को मैं सो जाता हूँ,
तब डैडी देर से आते हैं,
और छोटा-सा इक 'किस' करके,
थक, बिस्तर में गिर जाते हैं।
अब कान्वेंट में पढता हूँ,
टीचर से शिक्षा पाता हूँ,
भारी बस्ते के बोझ तले
हरदम ही सहमा रहता हूँ।
क्या दिया है इस अंग्रेज़ी ने,
क्यों हिन्दी को छोड़ा हमने,
एक प्यार का रिश्ता था अपना,
वो भी तो तोडा है इसने।
हे प्रभु मुझे तुम शक्ति दो,
हिन्दी को फिर लौटा लाऊँ,
इस अंग्रेज़ी के पिंजरे को
तोडू, आजादी पा जाऊं।

--रेनू जैन





ये मेरी पहली रचना है जो सन् १९८८ में मैंने लिखी थी बहुत ढूँढने पर आख़िर मिल ही गई, आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी.

आज का भगवान
मैं मैं हूँ मैं जो कहता हूँ
वो करके रहता हूँ¡
अगर विश्वास न हो तो,
कुछ बातें कहता हूँ
मुझे पाने के लिये लोग
बडे़ से बड़ा जुर्म किये जाते हैं
सच्चाई से कुछ नहीं होता,
मेरे लिये झूठ पर झूठ बोले जाते हैं
सिर्फ मेरे ही बल पर
सारी उलझनों को हल कर
कुछ तो पिस्ते बादाम खाते हैं
मगर अब तो बुरा हाल है भईया
दो वक़्त की रोटी तो दूर
दाने-दाने को तरस जाते हैं
सरकारी हो या ग़ैर सरकारी
सभी वर्गों के कर्मचारी
मुझे उपयोग में लाते हैं
जिसके कई नाम हैं जैसे
दान, चायपानी, मस्का, रिश्वत,
अरे भाई ख़ाली रोटी से तो
पेट नहीं भरता पर,
मेरे लिये ज़रुरत पड़े तो
लोगों का ख़ून तक पी जाते हैं
मैं जिसके साथ रहूँ
ज़िन्दगी उसकी निराली है
हर सुबह को वह होली खेले
हर शाम उसकी दिवाली है
मैं जिससे रुठ जाऊं
चाल शराबी वाली है
ख़ाने को दिल करे कभी कुछ
पर जेब पड़ी ख़ाली है
इसीलिये कहते हैं यारो
मैं मैं हूँ मैं जो कहता हूँ
वो करके रहता हूँ
दुनिया को बस में करता हूँ¡
अगर कोई शक हो दिल में
तो अंत में ये कहता हूँ
आज का भगवान है बड़ा महान
पहले तो वो उपरवाला रब्ब था
लेकिन अब मैं हूँ श्रीमान
नगद है भगवान भइया
नगद है भगवान भइया

--सुरिन्दर रत्ती





मेरी पहली कविता ---माँ के नाम जिन्हें मैंने अपनी युवावस्था मे ही खो दिया था |

जो तुम न देती कभी ये वेदना तो ,
क्या पा सकती थी कभी ये चेतना ?
दुःख न आता तब तक न रोता ह्रदय है ,
कुछ न पाता तब तक न खोता ह्रदय है |
आज मैंने प्यार खोकर वेदना को पा लिया है,
छोड़ ह्रदय का चैन कसक को अपना लिया है |
आज तुमने समझा दिया, दर्द क्या होता है दिल का,
घाव क्या होता विरह का, भाव क्या होता मिलन का,
पर विधि की विडम्बना क्या यह नही है,
दंड पाकर भी पुरस्कार पा रही हूँ ,
ह्रदय को जला कर भी मै जी रही हूँ
आंसू बहाकर भी मैं गा रही हूँ |
क्यो ऐसा होता है लेकिन '
वेदना से मुखरित होती कविता ,
बिछुड़ कर जननी से ही ,
सुंदर लगती गिरि से गिरती सविता

--मंजू भटनागर





वक़्त की दीवार
आया है जन्मदिन आपका ,इतने इंतज़ार के बाद ,
सोचा था हम आयेंगे ज़रूर ,सबके जाने के बाद !
वक़्त की दीवार ,मगर पार कर सकी न मैं ,
हर कोई आया मगर आ सकी न मैं !
देखी न इतनी वफ़ा हर किसी की राह में ,
सबको मिले स्नेह आपसे ,
हर कोई रहे आपकी चाह में !
सार्थक किया है नाम `मधु ' आपने ,
अपनी बातों में ,मुस्कान में !
यादों के उपवन में ,दुआओं की महक के सिवा
क्या दे सकता है गुलाब को ,केतकी का फूल !
मगर दुर्भाग्य मैं केतकी --
एक गंधहीन फूल ,
जो चाहते हुए भी किसी को
सुगंध नहीं दे सकती
अनचाही दीवार तोड़ नहीं सकता !
मैं केतकी ,आप गुलाब को क्या तोहफा दूँ ?
चाह कर भी में रह न सकी अपने वादों में ,
दुआ ही तोहफा है पास मेरे ,
कुबूल करिये अपने हाथों में !

ये कविता आज से २८ वर्ष पहले २७/०९/७९ को मैंने अपनी प्रिय मित्र मधु जी के जन्मदिन पर लिखी थी !उस दिन बहुत चाहते हुए भी मैं उनके जन्मदिन पर जा न सकी थी !इस बात से व्यथित हो कर मैंने पहली बार कागज़ और कलम हाथ में ली और एक ही बार में ये कविता लिख डाली !इस प्रकार इस कविता से मेरी काव्य यात्रा प्रारंभ हुई !मेरा प्रसिद्द नाम शिखा है ,परन्तु काव्य तथा लेखन जगत में मैं शिवानी नाम से जानी जाती हूँ !

--शिवानी सिंह





उन दिनों मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था मेरा बहुत ही घनिष्ठ मित्र के साथ एक दिन खेलते समय मेरा झगडा हुआ. हमने तय किया की अब कभी बात नहीं करेंगे और मात्र अगले दिन ही इतनी बेचैनी अनुभव की की मेरे जीवन की यह पहली रचना के रूप में जन्म ले गयी. अगले दिन उसे बिना बोले हुए मैंने उसे यही कविता चुपचाप पकड़ा दी और उसके बाद वह स्वयम पढ़ते ही अश्रुपूरित हो गया. फ़िर कभी हम नहीं झगड़े.
दुर्भाग्य से डाक्टर सुरेशचन्द्र शुक्ला बाद में कानपुर से मेडिकल का अध्ययन करते हुए हॉस्टल जीवन से ही ड्रग लेने की लत पड़ जाने के कारण मात्र 47 वर्षों की आयु में ही इस दुनिया से चल बसे. बहुत दिनों बाद इस बार गाँव गया तो अपने उसी बालसखा की समाधि पर उड़ती धूल को देखकर बचपन की सारी स्म्रतियाँ आंखो से गुजर गयीं. उनके साथ बचपन की मृदुल स्मृतियों को समर्पित है मेरी पहली कविता युग्म के इस सार्थक प्रयास को साधुवाद

याद दिला दूँ
बचपन की राहें याद हैं बन्धु !
या भूले हो याद दिला दूँ
साथ साथ कंदुक की क्रीडा
याद है बन्धु .... !
या भूले हो याद दिला दूँ
सुधि की पगडण्डी पर बिखरे
आंसू अपने जो कब से हैं
उन्हें गूँथ तेरी ही सुधि को .....
कह दो ...
प्रेम हार पहना दूँ ..
या भूले हो ...
याद दिला दूँ

--श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'





और एक दिन पापा जिन्हें मैं सबसे अधिक प्यार करती थी 12 की परीक्षा में मेरे कम अंक आने पर शायद बहुत नाराज हो गये. मुझे कुछ समझ नहीं आया और चुपचाप बस में बैठकर नानी के पास बिना बताये चली गयी. बिना बताये घर से नानी के पास चले जाने के कारण पापा ने कहा अब नानी के पास ही रहो साथ ही मेरे वापस घर लौटने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. एक कवि की बेटी थी प्रायः पापा के साथ काव्य गोष्ठी में जाना होता. सोचा पापा को अपनी बात कैसे कहूं. और फ़िर एक दिन नानी के यहाँ ही गंभीर बीमार होते हुए यह रचना मेरे हाथों से लिखी गयी. तबसे आज भी डायरी और कविता लिख लेती हूँ. आज मुझे नहीं याद जब हम मिले तो इस रचना को पढ़कर पापा अधिक रोये थे या मैं. हाँ उसदिन से पापा ने मेरा काव्य उपनाम अवश्य 'नीर' रख दिया. युग्म के इस अभिनव प्रयास को समर्पित है मेरी यह पहली कविता पीड़ा.

पीड़ा

उर में पीड़ा रोये
ऑंखों से लोहू बरसे
तेरी स्मृति की सुरभि
मानस में धीरे बरसे
घन तम में पीड़ा रोयी
आंखों से लोहू बरसा
आंखों का बेकल पँछी
युग युग से तुमको तरसा
दुख दर्द भींच होंठों में
हमने चाहा मुस्काना
बह चली अचानक पीड़ा
आंखों नें रोना जाना
हा देव ! मुझे जलने का
अभिशाप दे दिया अच्छा
पर इस जलते उर पर भी
दो आंसू कण बरसाना

--अमिता 'नीर'





यह कविता मैने छठीं कक्षा में अपने हिन्दी टीचर के प्रोत्साहन पर लिखी थी। उसके बाद से आज तक उनके आशिर्वाद से कई कविताएं लिखीं पर यह कविता जीवन के हर पहले अनुभव की तरह ही अविस्मरणीय है। जब भी इसे पढ़ती हूँ बचपन की यादें फिर से मन में उमड़-घुमड़ सी मचाने लगतीं हैं।

मौसम
सब पंछी उड़ जाते हैं।
जब बादल गरजाते हैं।
जब अंबर पर छाते हैं।
तब बारिश हो जाती है।
जब धरती प्यासी होती है।
बैठी कोने में रोती है।
तालाब सूख जब जाते हैं।
तब बारिश हो जाती है।
जब बारिश हो जाती है।
पंछी डाली पर आते हैं।
जब कोयल गीत सुनाती है।
तब धरती मुस्काती है।
तब धरती मुस्काती है।
जब सरिताएं भर जाती हैं।
जब मोर नाचने लगते हैं।
और इंसा खुश हो जाते हैं।
पर तब सर्दी भी आती है।
जब नदियॉ शीतल होती हैं।
जब लोग ठिठुर कर सोते हैं।
और पंछी दुबके होते हैं।
तब पशु भी छिपते फिरते हैं।
और साफ समा हो जाता है।
तब तारे टिम-टिम करते हैं।
और सूरज प्यारा लगता है।
लेकिन तब गर्मी आती है।
पौधे सब मुरझा जाते हैं।
सब जन अलसा जाते हैं।
और ठंडा पानी पीते हैं।
दरार धरा पर पड़ती है।
सू‌खी सरिता भी रहती है।
सूरज दुश्मन होता है तब।
बादल प्यारा लगता है जब।
तब फिर से वर्षा आती है।
प्यारी धरती हो जाती है।
तब हरियाली छा जाती है।
घनघोर घटा जब आती है।
मौसम प्यारा हो जाता है।
जी को बहुत लुभाता है।
सब जन खुश हो जाते हैं।
धरती फिर से मुस्काती है।

--कु० स्मिता पाण्डेय