Friday, September 14, 2007

काव्य पल्लवन - सितम्बर-अंक ( हिन्दी-दिवस विशेष)





काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - हिन्दी दिवस

विषय-चयन - शोभा महेन्द्रू

पेंटिंग - सिद्धार्थ सारथी

अंक - सात

माह - सितम्बर 2007






इंटरनेट की दुनिया से जुड़े बहुत से नये-पुराने हिन्दी-कवि हमारे सम्पर्क में है। देश भर में हिन्दी-दिवस के अवसर पर दुनिया भर के जलसे होते हैं। हमने सोचा कि ज़रा हम भी काव्य-पल्लवन को आयोजित करके यह तो देखें कि ये इंटरनेटिया कवि क्या सोचते हैं? उनका मंथन आपके सामने है। हिन्द-युग्म इस अवसर पर आप सभी से यही प्रार्थना करेगा कि हिन्दी का प्रयोग करें, इंटरनेट की दुनिया पर भी इससे राज करवाया जा सकता है, हमारी संख्या बहुत है। बस आप ठान लें कि आप भी हिन्दी में लिखेंगे और १० लोगों को हिन्दी-प्रयोग के लिए प्रेरित करें। किसी भी प्रकार की मदद के लिए हिन्द-युग्म हाज़िर है।


चूँकि इस बार समय कम था। हमें १४ सितम्बर २००७ को इस अंक को प्रकाशित करना था, अतः हरेक कविता के लिए पेंटरों को समय नहीं मिला। एक थीम-पेंटिंग बनाकर भेजा है सिद्धार्थ सारथी ने।




***प्रतिभागी कवि***

निखिल आनंद गिरिप्रतिष्ठा शर्माशोभा महेन्द्रूकवि कुलवंत सिंहश्रीकांत मिश्र 'कांत'तपन शर्मारंजना भाटियामहेन्द्र मिश्रासजीव सारथीअजय यादवरितू बंसलअनुराधा श्रीवास्तवकुमार आशीषदिव्या श्रीवास्तवप्रो॰ नरेन्द्र पुरोहितराजीव रंजन प्रसाद

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





रुधिर-की बहने दो अब धार,
स्वर गुंजित हों नभ के पार,
किए पदताल भाषा के सिपाही आए,
खोलो, खोलो तोरण द्वार......
बहुत-सा हौसला भी, होश भी, जूनून चाहिए...
हिंदी को ख़ून चाहिए...

गुलामी-की विवशता हम,
समझने अब लगे हैं कम,
तभी तो एक परदेसी ज़बां,
लहरा रही परचम ,
नयी रच दे इबारत, अब वही मजमून चाहिए...
हिंदी को ख़ून चाहिए....

हुई हैं साजिशें घर में,
दिखे हैं मीत लश्कर में,
पड़ी है आस्था घायल,
अपने ही दरो -घर में...
उठो, आगे बढ़ो , हिंद को सुकूं चाहिए....
हिंदी को ख़ून चाहिए....
हिंदी को ख़ून चाहिए.....

निखिल आनंद गिरि



गुजराती, मराठी, तमिल हो या
हो अंग्रेज़ी, सब को अपनाए,
पर हिन्दी को ना भुलाए |
आओ हिन्दी-दिवस मनाए ||

कवियों का कवित्व जगाये,
कहानियो का कलश सजाये,
‘बाल-उद्यान’ की गंगा बहाये,
आओ हिन्दी-दिवस मनाए ||

पर फिर कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं भाव हैं,
सभ्यता हैं, संस्कृति हैं, संस्कार हैं,
अपनी सभ्यता को अपनाने के लिये,
क्या हिन्दी-दिवस की जरूरत हैं?

माना हिन्दी को और प्रखर बनाना हैं|
उसे विश्व रूपी मंच पर सजाना है|
पर 'हिन्द-युग्म' चलाने के लिये,
क्या हिन्दी-दिवस की जरूरत हैं?

अब तो जार्ज बुश ने भी जाना है
हमारी भाषा का लोहा माना है|
बिल गेट्स के साफ़्टवेयर में भी आती है,
विश्व भर में हिन्दी और हिन्दुस्तानियों की ख्याती है||

हिन्दी है इस जग के माथे की बिन्दी,
हम सब के मन में बसी है हिन्दी|
हिन्दी-दिवस से हमें एतराज़ नहीं,
पर हिन्दी, हिन्दी-दिवस की मोहताज़ नहीं||


प्रतिष्ठा शर्मा



मैं एक अध्यापिका हूँ
हिन्दी पढ़ाती हूँ ।
मत पूछो दिन भर
कितना सकपकाती हूँ ।
जब भी कहीं किसी से
मिलने जाती हूँ --
बहुत आत्मविश्वास जताती हूँ ।
किन्तु प्रथम परिचय में ही-
पानी-पानी हो जाती हूँ ।
जब कोई पूछता है-
आप क्या करती हैं ?
मैं बड़े गर्व से कहती हूँ -
मैं एक अध्यापिका हूँ ।
अच्छा---?
किस विषय की -?
इस प्रश्न का सामना
कभी नहीं कर पाती हूँ ।
सुनते ही बहुत नीचे
धँस जाती हूँ ।
लगता है ये एक ब्रह्मास्त्र है ।
जो मेरे आत्मविश्वास को
खंड-खंड कर देगा ।
और मैं -चाह कर भी
अपनी रक्षा नहीं कर पाऊँगी ।
प्रश्न फिर गूँजता है--
किस विषय की ---
जी --हिन्दी की
बहुत कोशिश करके कहती हूँ ।
सभी के चेहरों का सम्मान
हवा हो जाता है ।
और आँखों में-
एक हिकारत सी आ जाती है ।
मुझे लगता है--
मैं कोई बड़ा अपराध कर रही हूँ ।
अंग्रेज़ी प्रधान लोगों में
हिन्दी का प्रचार कर रही हूँ ।
मेरे विद्यार्थी हिन्दी से
उकता जाते हैं ।
पर जब कभी--
बहुत प्यार जताते हैं -
तब पूछ बैठते हैं -
मैम आप ने हिन्दी क्यों ली ?
उस वक्त मेरी नसें -
फड़फड़ाने लगती हैं ।
किन्तु प्रत्यक्ष में
खिसियाकर मुसकुराती हूँ ।
पर कोई ठोस कारण
नहीं बता पाती हूँ ।
एक बार प्रयास किया था ।
हिन्दी के महत्व पर
बड़ा-सा भाषण दिया था ।
धारा प्रवाह हिन्दी का
जयगान किया था ।
किन्तु एक विद्यार्थी ने
झटके से पूछ लिया था --
क्या आगे काम आएगी ?
नौकरी दिलवाएगी ?
मेरा उत्साह शून्य में खो गया
मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी -
किन्तु मेरी ये बातें कौन सुनेगा?
हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है--
तो हुआ करे----
वह वैज्ञानिक और सरल है-
किन्तु नौकरी तो नहीं दिला सकती ।
विदेश तो नहीं भिजवा सकती ।
मुझे अपने हिन्दी पढ़ाने पर
शर्म आने लगती है ।
दूर-दूर ढूँढ़ती हूँ -
पर कहीं कोई हिन्दी प्रेमी नहीं मिलता ।
हिन्दी के लिए मान
झीना होने लगता है ।
और मुझे कुछ चेहरे
दिखाई देने लगते हैं ।
अंग्रेजी बोलते-- फ्रैंच सीखते-
और हिन्दी को दुदकारते ।
मैं इन चेहरों को पहचान
नहीं पाती हूँ ।
और तभी मुझे कोने में
डरी-सहमी हिन्दी दिखाई देती है ।
मेरी ओर बहुत कातर दृष्टि से देखती--
उसकी आँखों का सामना
नहीं कर पाती हूँ ।
टूटते शब्दों से
दिलासा पहुँचाती हूँ ।
किन्तु हिन्दी-दिवस पर
अपनी भाषा को
कुछ नहीं दे पाती हूँ ।
हिन्दी दिवस मनाने वालों-
आज एक संकल्प उठाओ-
अंग्रेजी भले ही सीखो-
पर अपनी भाषा को
मत ठुकराओ ।
उसे यूँ अपरिचित ना बनाओ ।

शोभा महेन्द्रू



अभिमान है,
स्वाभिमान है,
हिंदी हमारा मान है ।

जान है,
जहान है,
हिंदी हमारी शान है ।

सुर, ताल है,
लय, भाव है,
हिंदी हमारा गान है ।

दिलों का उद्गार है,
भाषा का संसार है,
हिंदी जन-जन का आधार है ।

बोलियों की झंकार है,
भारत का शिंगार (शृंगार) है,
हिंदी संस्कृति का अवतार है ।

विचारों की खान है,
प्रेम का परिधान है,
हिंदी भाषाओं में महान है ।

बाग की बहार है,
राग में मल्हार है,
हिंदी हमारा प्यार है ।

देश की शान है,
देवों का वरदान है,
हिंदी से हिंदुस्तान है ।

कवि कुलवंत सिंह



हिन्द में हो हिन्द का युग
हिन्द-युग्म हो हर हाथ में
यह सलोनी लाडली
रस भाव लाये साथ में

पाठकों प्रिय प्रेरकों
मम हृदय रचनाकार से
करें सब सहयोग इसका
र्निभाव निर्विकार से

विश्व में संस्कृत-सुता
हिन्दी हमारी भारती
सर्व प्रिय हो राष्ट्रभाषा
हम करें इसकी आरती

' कान्त ' उर अभ्यर्थना
हर शारदा परिजन सुने
हो स्रजित साहित्य अनुपम
विश्व स्वर गुंजन सुने

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'



भाषाओं में एक ये भाषा,
कहते जिसे हम हिंदी हैं।
इतिहास इसका सदियों पुराना,
माथे पर सजती बिंदी है।।

देश के आधे हिस्से में,
आज भी है ये बोली जाती।
पर "बूढ़ा" कह कर हिंदी को,
रह-रह नब्ज़ टटोली जाती।।

भारी जन समूह की प्रतिनिधि को,
न मिला राष्ट्रभाषा का सम्मान।
विदेशी पट्टी आँखों में बाँध,
करते रहे हैं हम अपमान।।

झूठी शान का पहन के हार
अंग्रेज़ी फ़ैशन से सब हैं ग्रस्त।
सब ज़ोर से "ए बी सी" सुनाते हैं,
पर "क ख ग" में होते हैं पस्त।।

अपनी ही भाषा बोलने से जब,
लोग कतराने लगते हैं।
विदेशी को सर बिठाया जाता है,
और हिंदी से शरमाने लगते हैं।।

तब स्वयं को उपेक्षित देखकर,
"हिंदी" कोने में दुबक जाती है।
अश्रु इतने बहते हैं कि,
आँखें सूखी पड़ जाती हैं।।

उन पथराई नज़रों से तब,
एक आवाज़ आती है।
अब शांत नहीं रहना है मैंने,
कहकर फ़ैसला सुनाती है।।

जब विदेशियों ने भी मुझको,
नम्रता से स्वीकारा है ,
तो अपने देशवासियों को मैंने,
स्वयं पर गर्व करना सिखलाना है।

हिंद देश के तुम वासी हो,
हिंदी से करो न परहेज।
ये तुम्हारी ही विरासत है,
विनती है, रखना सहेज।।

तपन शर्मा



हिन्दी-दिवस की सुबह
सबको हिन्दी याद आई
नेता जी ने भी आज देखो
क्या 'स्पीच' है बनायी

लेडीज़ एण्ड जेन्टलमेन!
आज का 'ब्यूटीफुल' दिन है आया
हमने अपनी हिन्दी 'लैंग्वेज' को
'इंडिया' की 'मदर टंग' बनाया

इंडिया प्यारी 'कंटरी' है हमारी
हमें पूरे 'वर्ल्ड' में लगती है प्यारी
हम इंडिया में रहने वाले सब
हिन्दुस्तानी है .....
इस लिए हिन्दी में बात करना
बहुत 'प्राऊड' की निशानी है ,

पर आज की 'यंग जनरेशन'
इस बात को कब समझ पाती है
हर बात में बस अपनी
'इंग्लिश लैंग्वेज़' ही हमको सुनाती है

हमको अपनी हिन्दी 'लैंग्वेज़' को
'वर्ल्ड' में महान बनाना है
तभी सच होंगे सब 'ड्रीम'
हमारी इंडिया के
हमने इस 'लैंग्वेज़' को
अब 'वर्ल्ड -वाइड' बनाना है

आपने अपना कीमती 'टाइम' दिया
मैं इसका बहुत 'थैंकफुल' हूँ
'इंग्लिश' में हर बात करना
'कम्प्लीटली रॉन्ग' है
हिन्दी 'लैंग्वेज़' को
आगे लाना ही अब 'इंडिया' की शान है !!

रंजना भाटिया



हिंदी है हमारी जननी भाषा , हि‍न्दी भाषा है सबसे न्यारी
एक अदभुत तकनीकी भाषा, जैसा सुनते वैसा लिखते
वैसा ही अपने भाव पाते, हिंदी की वर्णमाला हमें
पढ़ने-लिखने की सीख देती कर्म करने का पाठ पढ़ाती
क से कर्म करो , ख खाओ खिलाओ का नारा देता
ग ग़लत न करो भाई ,घ घर साफ़ रखो तुम भाई
च चलते रहो नौजवान तुम, छ कहता छल कपट न करो भाई
ज जय जवान का तो ट टालना नहीं स्वदेश धर्म है भाई
त तनकर चलने की सीख देता, ड कहता डरो मत भाई
थ थको मत अच्छे कामों से, द दया धरम का पाठ सिखाता
ध कहता धन कमाओ पर न कहता नमक हलाल न होना
प परोपकार करो तो फ फसल उगाने का संदेश देता भाई
ब बड़ों के आदर को कहता तो र ना रोने की सीख देता
य यही तो ज़िंदगी है तो भ भारत मेरा महान है भाई
व कहता वीर बनो तो ल लालच न करने की सीख देता
स सच कहता है तो ह हम सब एक है भाई
ज्ञ कहता ज्ञान दो और ज्ञानी हो जाओ भाई
हिंदी हमारी जननी भाषा, हिंदी भाषा है न्यारी...भाई
..................

महेंद्र मिश्रा



मैं आज के हिंद का युवा हूँ,
मुझे आज के हिंद पर नाज़ है,
हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
सुनो, हिन्दी मेरी आवाज़ है.

संकीर्णतायें समाज की टूट रही है,
अब हिन्दी से परहेज किसे है,
कहने को अपनी बात, सशक्त शब्दों में,
भाषा मेरी अब अंग्रेजी की मोहताज नहीं है.

चाहे गीत लिखूं या कहूँ कोई कविता,
मेरे भाव, मेरी कल्पनाओं की परवाज है,
हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन ,
सुनो, हिन्दी मेरी आवाज़ है.

संस्कृत की गंगोत्री से निकलकर,
हमजुबां उर्दू से मिलकर,
ब्रजभाषा, मैथली, मारवाड़ी कहीं
तो कहीं अवधी, भोजपुरी में ढलकर,
सिन्धी, पंजाबी, हरियाणवी, गुजराती,
बंगला, और तमाम द्रविड़ भाषाओं से जुड़कर,
समस्त राष्ट्र को एक सूत्र मे बाँध रही है हिन्दी आज,
सरल है, समृद्ध है, सम्पूर्ण है मेरी हिन्दी आज,

अंतरजाल पर जब से आयी, छा गई है विश्वपटल पर,
गर्व से कहता हूँ मैं, मेरी हिन्दी भाषाओं में सरताज है
हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन ,
सुनो, हिन्दी मेरी आवाज़ है.

सजीव सारथी



इस बार भी हिंदी-दिवस मनाया जायेगा
ज़ोर-शोर से हिंदी का ढोल बजाया जायेगा
दिल बहलाने को आखिर खयाल अच्छा है

वो हिंदी का पहनते हैं, हिंदी की खाते हैं
इसलिये हर साल हिंदी-दिवस मनाते हैं
आखिर नौकरों को भी पगार दी जाती है

हिंदी-दिवस पर भाषण देकर लौटते ही
हिंदी पढ़ते बच्चे को थप्पड़ मार दिया
बेवकूफ बेकार वक्त खराब कर रहा था

हिंदी-दिवस पर भाषण देते नेता जी से पूछा था
अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल में क्यों पढ़ाते हो?
शाम को उसके घरवाले थाने के चक्कर लगा रहे थे

भारत में हिंदी को, माथे की बिंदी को
अपने जो कहाते हैं, वो ही नोच खाते हैं
हिंदी-दिवस भी तो कमाई का तरीका है

अजय यादव



कल रात स्वप्न में
मेरी मुलाकात हिन्दी
से हो गई ।
डरी,सहमी कातर
हिन्दी को देखकर
मैं हैरान सी हो गई ।
मैंने पूछा -
तुम्हारी यह दशा क्यों ?
तुम तो राष्ट्र भाषा हो ।
देश का स्वाभिमान हो ।
हिन्द की पहचान हो ।
यह सुनते ही--
हिन्दी ने कातर नज़रों से
मेरी ओर देखा ।
उसकी दृष्टि में जाने क्या था
कि मैं पानी-पानी हो गई ।
मेरे अन्तर से जवाब आया
जिस देश में राष्ट्र भाषा
की यह दशा हो--
उसे राष्ट्रीय अस्मिता की बातें
करने का क्या अधिकार है ?
जब विदेशी ही अपनानी है
तो इतना अभिनय क्यों ?
हिन्दी-दिवस जैसी औपचारिकताएँ
कब तक सच्चाई पर पर्दा
डाल पाएँगी ?
शर्म से मेरी आँखें
जमीन में गड़ जाती हैं
और चुपचाप आगे बढ़ जाती हूँ ।
किन्तु एक आवाज़
कानों में गूँजती रहती है ।
और बार-बार कहती है -
हिन्दी -दिवस मनाने वालो
हिन्दी को भी तुम अपनाओ ।
क्योंकि--
अपनी भाषा ही उन्नति दिलाएगी
किन्तु अगर
अपनी माँ ही भिखारिन रही तो--
पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी ।
कुछ नहीं दे पाएगी -----

रितू बन्सल



मैं सोच-सोच कर शर्मिन्दा हूँ
हाँ सही में कितनी अजीब बात है
आज घर में ही बेघर हो तुम-
आहत हो ,अपमानित हो
अपनी ही संतति से अवहेलित हो
पर क्यों?
राष्ट्रभाषा का तमगा है
प्रयास दर प्रयास
बढ़ावा देने के नाना यत्न
पर क्यों?
हाँ -कसमसा रही हूँ "मैं"
देख कर औपचारिक रीति-रिवाज
"हिन्दी -दिवस"
क्या खूब अब मैं अपने ही घर में हूँ-
फटे हाल, बेबस,लाचार
लज्जित होते हैं
जहाँ बोलने में मुझे
मेरे अपने नौनिहाल
भरा-पूरा घर होते जैसे -मैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में
सिसकती, बिलखती सी
बेसहारा, झूझती सी
और दूसरी तरफ
समाजसेवी चिल्ला-चिल्लाकर
कर रहे हैं हल्ला-
"मातृभाषा को अपनाना होगा
राष्ट्रभाषा को फैलाना होगा
प्रान्तीयता की सीमाओं को काट
हिन्दी को अपनाना होगा"
आह इतना अपमान
जैसे माँ को माँ होने का
देना होगा इम्तिहान
जब करती हूँ आत्मनिरीक्षण
तो लगता है जैसे मेरे अपनों ने
किया है-व्याभिचार
मेरी हालात के जिम्मेदार -
कोई एक नहीं -हैं तमाम
वो सरकारी नीतियाँ-
जहाँ राष्ट्रभाषा के नाम पर हैं
अभी भी क्लिष्ट
उर्दू-फारसी युक्त सरकारी फरमान
कारपोरेट जगत की झूठी शान
जहाँ हिन्दी बोलने से होता है अपमान
आधुनिकता की जहाँ
पीढी विशेष ने चस्पा किया है अदृश्य सा साइनबोर्ड
"हिन्दी का प्रयोग है पूर्णतः वर्जित "
इतनी अवहेलना, इतना अपमान
फिर भी कहते हो-
"मेरा भारत महान
मेरी भाषा महान"
हिन्दी नहीं थी कभी
"हिन्दी दिवस ", भाषणों ,आयोजनों की मोहताज
जो बसती थी दिलों में
करती थी राज
वो आज हुई अजनबी समान
सोचो ऐसा क्यों?
थोड़ी सी बस थोड़ी सी
जरुरत है आत्ममंथन की
पाओगे कमी है -
आत्माभिमान की
खुद पर संस्कृति पर
भाषा पर देश पर
जब करोगे गर्व
तब ही निज भाषा
करेगी उन्नति
पायेगी समृद्धि ।

अनुराधा श्रीवास्तव



भारत की पहचान हो हिन्‍दी
जनमनगण का गान हो हिन्‍दी
रची बसी हो जनजीवन में
अधरों की मुसकान हो हिन्‍दी

कुमार आशीष



हिन्दी दिवस तुझे नमन
तेरे आने से सम्रत हुआ
अंग्रेजी सागर में डूबे हुये लोगों को
कि तेरा भी अस्तित्व है

आज उदघोषित होंगे... तेरे उठान हेतु कई उपाय
होंगी कितनी ही सभायें
तू मौन रह देखना इस मनोरंजक नाटक को

कल तू फ़िर से अकेली.. कुछ पिछड़े हुये
लोगों के होंठो पर खेलेगी
उनके कलम से निकलेगी
वही लोग... बैठ कर फिर से इन्तजार करेंगे
अगले हिन्दी दिवस का
हिन्दी दिवस तुझे नमन

दिव्या श्रीवास्तव



आओ-आओ सुनो कहानी हिन्दी के उत्थान की
हिन्दी की जय बोलो हिन्दी बिन्दी हिन्दुस्तान की ।
हिन्दी को नमन--हिन्दी को नमन ।

सबकी भाषा अलग-अलग है, अलग अलग विस्तार है
भावों की सीमा के भीतर, अलग-अलग संसार है ।
सब भाषाओं के फूलों का, इक सालोना हार है ।
अलग-अलग वीणा है, लेकिन एक मधुर झंकार है ।
भाषाओं में ज्योति जली है, कवियों के बलिदान की ।
हिन्दी की जय बोलो हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की ।

हिन्दी की गौरव गाथा का नया निराला ढंग है ।
कहीं वीरता, कहीं भक्ति है, कहीं प्रेम का रंग है ।
कभी खनकती हैं तलवारें, बजता कहीं मृदंग है ।
कभी प्रेम की रस धारा में, डूबा सारा अंग है ।
वीर भक्ति रस की ये गंगा, यमुना है कायान की
हिन्दी की जय बोलो, हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की ---

सुनो चंद की हुँकारों को, जगनिक की ललकार को
सूरदास की गुँजारों को, तुलसी की मनुहार को
आडम्बर पर सन्त कबीरा की चुभती फटकार को
गिरिधर की दासी मीरा की, भावभरी रसधार को
हिन्दी की जय बोलो हिन्दी-बिन्दी हिन्दुस्तान की
हिन्दी को नमन--हिन्दी को नमन।

भारतेन्दु ने पौधा सींचा महावीर ने खड़ा किया
अगर गुप्त ने विकसाया तो जयशंकर ने बड़ा किया
पन्त निराला ने झंडे को मजबूती से खड़ा किया ।
और महादेवी ने झंडा दिशा-दिशा मे उड़ा दिया
गिरिधर की दासी मीरा के सुनी सरस उद्‌गारों को
देव बिहारी केशव की कविता है प्रेमाख्यान की
हिन्दी की ये काव्य कथा है हिन्दी के गुनगान की

हिन्दी की जय बोलो हिन्दी बिन्दी हिन्दुस्तान की
आओ-आओ सुनो कहानी हिन्दी के उत्थान की।

प्रो॰ नरेन्द्र पुरोहित



प्रलयंकर तूफानों के बाद शेष तबाहियाँ
यह हिन्दुस्तान की कहानी है
यह सौ करोड़ मुर्दों का देश है
जिनमें लहू का उबाल नहीं, सिर्फ पानी है
शायित है भारत का भाग्य
कफन ओढ़ मानवता है
सर्वत्र, घुटन अश्क और दर्द ही की सत्ता है
हमारी संस्कृति की उदात वृत्तियों का गुल्म मुर्झा गया है
सदियों की गुलामी सहते
भारत!! क्या इतना जरजर, इतना लड़खड़ा गया है
कि प्रतीत हो सर्वत्र अंधेरा ही अंधेरा छा गया है
वस्तुत: हमारी मानसिकता आज भी गुलाम है
इसीलिये हमारा अपनत्व, हमारी संस्कृति
सबसे अहं हमारी भाषायी सत्ता
हो रही क्षत विक्षत
और भाषा के प्रश्न पर लाखों व्यूह-प्रत्यूह...
मातृ भाषा के बिना
राष्ट्र की दुर्दशा है वही
जैसी कि पर्जन्य विरहित मरुस्थल की
आवश्यकता है मातृभाषा के
मातृ शब्द के वात्सल्य को पहचानने की
यह मानने की कि हम नि:सत्व नहीं हैं
दौड़ती दुनियाँ की भीड़ में हम भी कहीं हैं
माना कि वह शृंगार देश का है
मस्तक की है बिन्दी
किंतु अपने अधिकारों की याचक
भिखारिणी है हिन्दी
जन-जन की समानता के अधिकारों का
हनन हो रहा है
क्योंकि दो प्रतिशत लोगों के हाथों
अनठानबे प्रतिशत के अरमानों का पतन हो रहा है
अपने अपने गिरेबान में झांको
झूठी सामाजिक श्रेष्ठता की बू आयेगी
आँख मिला सको अंतरात्मा से
तडपती, सिसकती, अधमरी हिन्दी नज़र आयेगी
जिसकी इस दशा का दायित्व तुम्हारा होगा
गहरायी में सोचो, तुम्हारा अहं भी हारा होगा
अरे झूठी शान की भुलभुलैया में भटके राही
अपनी सोच को आयाम दो
हिन्दी में अपनी रागात्मकता को अपानाओ
छिन्न-भिन्न तो न करो
अंधे हैं आज देश के कर्णधार
इनमें सामर्थय नहीं
विरासत है इनकी पराधीन मानसिकता
और यही बोझ हम पर थोपा जा रहा है
छीना जा रहा है हमारा हक
अपनी मंजिल खुद तलाश करने का
हम देश के भावी कर्णधार, देश का भविष्य हैं
हमें रास्तों में फूल नहीं, मंजिल पर उजाला चाहिये
और हमें अपने भविष्य के लिये अंग्रेजी नहीं हिन्दी चाहिये
चूंकि भविष्य का निर्माण तो हम करेंगे
अपनी मेहनत के बल पर निष्प्राण भारत में प्राण भरेंगे
दूर रखना है हमें नंगी नाचती संस्कृति
और दूसरों का हक छीनती भाषा
हिन्दी ही भारत की प्रगति की है परिभाषा
आइये हम नया जहान बनायें
मीठे झूठ के परबत से टकरायें
रंगहीन भारत में आकर्षण भरना है
केवल हिन्दी ही से पूरा हो सकता सपना है
आइये एक दीप बन कर
ज्योत से ज्योत जलायें
फैलायें यह भाव
हमारे देश की आशा
हिन्दी हो कार्य भाषा
हिन्दी है राष्ट्र भाषा..

राजीव रंजन प्रसाद



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22 पाठकों का कहना है :

Avanish Gautam का कहना है कि -

माफी चाहता हूँ लेकिन कहना पड रहा है कि हिन्दी दिवस पर लिखा बहुत गया...बस कविता ही नहीं लिखी गई

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

हिन्दी दिवस की सभी "हिन्दी-प्रेमी -हिन्दोस्तानियों" को शुभकामनायें।

काव्य-पल्लवन का विषय तो सामयिक था किंतु अधिक प्रविष्टियाँ नही हैं।

निखिल आनंद गिरि
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कवि की ओजस्विता सराहनीय है और एसे कलम से सिपाही आज की आवश्यकता भी हैं:

हुई हैं साजिशें घर में,
दिखे हैं मीत लश्कर में,
पड़ी है आस्था घायल,
अपने ही दरो -घर में...
उठो, आगे बढ़ो , हिंद को सुकूं चाहिए....
हिंदी को ख़ून चाहिए....
हिंदी को ख़ून चाहिए.....

प्रतिष्ठा शर्मा
----------------------------------

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं भाव हैं,
सभ्यता हैं, संस्कृति हैं, संस्कार हैं,
अपनी सभ्यता को अपनाने के लिये,
क्या हिन्दी-दिवस की जरूरत हैं?

पर हिन्दी, हिन्दी-दिवस की मोहताज़ नहीं||

बहुत सुन्दर विचार। अच्छी रचना।

शोभा महेन्द्रू
----------------------------------
मैं एक अध्यापिका हूँ
हिन्दी पढ़ाती हूँ ।

किन्तु प्रथम परिचय में ही-
पानी-पानी हो जाती हूँ ।
जब कोई पूछता है-
आप क्या करती हैं ?
मैं बड़े गर्व से कहती हूँ -
मैं एक अध्यापिका हूँ ।
अच्छा---?
किस विषय की -?
इस प्रश्न का सामना
कभी नहीं कर पाती हूँ ।
शोभा जी, आपके इस दर्द का नाम राष्ट्रीय शर्म है। उस राष्ट्र का कुछ नहीं हो सकता जिसे अपनी संप्रेषणीयता के लिये विदेशी भाषा चाहिये। आप जैसे अध्यापक नहीं...वो अभिभावक शर्म से गडें जिनका बीज तो हिन्दोस्तानी है लेकिन जडें...हैं ही नहीं।

कवि कुलवंत सिंह
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हिन्दी पर अभिमान करते हुए आपने बखूबी कहा है:

देश की शान है,
देवों का वरदान है,
हिंदी से हिंदुस्तान है ।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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हिन्द में हो हिन्द का युग
हिन्द-युग्म हो हर हाथ में
यह सलोनी लाडली
रस भाव लाये साथ में
कांत जी नें हिन्दी और हिन्द युग्म को सुन्दर शब्द दिये हैं।

तपन शर्मा
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हिंद देश के तुम वासी हो,
हिंदी से करो न परहेज।
ये तुम्हारी ही विरासत है,
विनती है, रखना सहेज।।

हिन्दी की वकालत करती हुई तपन जी नें सुन्दर रचना प्रस्तुत की है।

महेन्द्र मिश्र
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पूरी वर्णमाला का सुन्दर काव्य प्रयोग। आप बधाई के पात्र हैं।

सजीव सारथी
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संस्कृत की गंगोत्री से निकलकर,
हमजुबां उर्दू से मिलकर,
ब्रजभाषा, मैथली, मारवाड़ी कहीं
तो कहीं अवधी, भोजपुरी में ढलकर,
सिन्धी, पंजाबी, हरियाणवी, गुजराती,
बंगला, और तमाम द्रविड़ भाषाओं से जुड़कर,
समस्त राष्ट्र को एक सूत्र मे बाँध रही है हिन्दी आज,
सरल है, समृद्ध है, सम्पूर्ण है मेरी हिन्दी आज,

अपनी भाषा पर गर्व करने के आपके तर्क बहुत अच्छे हैं।

अजय यादव
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भारत में हिंदी को, माथे की बिंदी को
अपने जो कहाते हैं, वो ही नोच खाते हैं
हिंदी-दिवस भी तो कमाई का तरीका है

आपके व्यंग्यों में धार अच्छी है। अच्छा प्रयास है आपकी यह रचना।

रितु बंसल
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अपनी भाषा ही उन्नति दिलाएगी
किन्तु अगर
अपनी माँ ही भिखारिन रही तो--
पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी ।
कुछ नहीं दे पाएगी -----

पता नहीं, इतनी सी बात यह देश कभी समझ भी पायेगा?

अनुराधा श्रीवास्तव
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जरुरत है आत्ममंथन की
पाओगे कमी है -
आत्माभिमान की
खुद पर संस्कृति पर
भाषा पर देश पर
जब करोगे गर्व
तब ही निज भाषा
करेगी उन्नति
पायेगी समृद्धि ।

इस सात्य को नकारा नहीं जा सकता। एक अच्छी रचना।

कुमार आशीष
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भारत की पहचान हो हिन्‍दी
जनमनगण का गान हो हिन्‍दी
रची बसी हो जनजीवन में
अधरों की मुसकान हो हिन्‍दी

छोटा और मधुर।

दिव्या श्रीवास्तव
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कल तू फ़िर से अकेली.. कुछ पिछड़े हुये
लोगों के होंठो पर खेलेगी
उनके कलम से निकलेगी
वही लोग... बैठ कर फिर से इन्तजार करेंगे
अगले हिन्दी दिवस का
हिन्दी दिवस तुझे नमन

कविता में भाषा की दुर्दशा पर आपकी पीडा खलकती है। एक अच्छी प्रस्तुति।

प्रो. नरेंद्र पुरोहित
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हिन्दी की जय बोलो हिन्दी बिन्दी हिन्दुस्तान की
आओ-आओ सुनो कहानी हिन्दी के उत्थान की।

जबरदस्त प्रस्तुति। "आओ बच्चों तुम्हें दिखाये झांकी हिदुस्तान की" कविता पढ्ते हुए इस गीत की झलक अवश्य मिलती है किंतु कथ्य की मौलिकता निस्संदेह प्रश्ने के परे हैं। शिल्प कसा हुआ है और यह एक उत्कृष्ट रचना है।

पुनश्च

हिन्दी-दिवस की शुभकामनाओं के साथ।

*** राजीव रंजन प्रसाद

shobha का कहना है कि -

हिन्दी दिवस की सभी भारतीयों को बहुत-बहुत बधाई । काव्य पल्लवन का अंक देखकर थोड़ी निराशा तो
अवश्य हुई कि हिन्दी पर लिखने वाले कितने कम हैं किन्तु खुशी इस बात की हुई कि जिसने लिखा
मन से लिखा ।
निखिल आनन्द गिरि की कलम तो अब गज़ब ढ़ाने लगी है । इतनी सशक्त रचना पढ़कर बड़ा सन्तोष
हुआ । उनकी ओजस्विता प्रशंसनीय है । कवि को बधाई एवं बहुत- बहुत आशीर्वाद।
प्रतिष्ठा जी ने हिन्दी को हिन्द युग्म के साथ अच्छा जोड़ा है । हाँ मैं भी मानती हूँ कि केवल हिन्दी-दिवस
मनाने से कुछ नहीं होगा । हिन्दी को अपनाना होगा । एक प्रभावशाली ओजस्वी रचना के लिए बधाई ।
कवि कुलवन्त ने हिन्दी का जयगान किया । पढ़कर दिल खुश हो गया । ध्वन्यात्मक शब्दों का
बहुत सुन्दर प्रयोग किया है आपने । बधाई ।
आज इतना ही।

Rajesh का कहना है कि -

Hindi Divas ke is paavan avsar per Hindi Yugm ke sabhi sadasya aur vachak ganon ko badhayi. Sabhi ki rachnayen kafi sarahniya hai.
Shobhaji, aap ko kabhi jo mahsoos karna padta hai Hindi ki Pradhyapika hone ke liye, is mein aap ka koi dosh nahi hai, aap ko kyon sharminda hona pade, aap to wah kaam kar rahi hai jise sabhi Bharat wasiyon ko karna hai. Yah kaam aap kar rahi hai is ke liye aapko to apna sir uper uthana chahiye aur aap ki aur aisi nigahon se dekhne walon ko sharma aani chahiye.
Ritu Bansal ji, aap ki char panktiyan bahut hi chot pahunchane wali hai - हिन्दी -दिवस मनाने वालो
हिन्दी को भी तुम अपनाओ ।
क्योंकि--
अपनी भाषा ही उन्नति दिलाएगी
किन्तु अगर
अपनी माँ ही भिखारिन रही तो--
पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी ।
कुछ नहीं दे पाएगी -----
Sabhi maante hai ki aaj ke is competition ke jamane mein english bahot hi jaroori ho gaya hai international level per apne aap ko banaye rakhne ke liye, parantu hum Hindustaniyon ko yah bhi nahi bhoolna chahiye ki hamari Rashtrabhasha ka bhi utna hi samman karna hai hamein.
Sabhi ko ek baar phir badhayi

Rajesh का कहना है कि -

Ranjana Bhatiya ji,
Bahot hi vyang dekhne ko mile aap ki hindi divas ke "NETAJI" ke bhashan ki rachna mein. sachmuch, agar aise hi NETA Hindustan ko milte rahe, to sochiye ki Hindustan mein Hindi ki dasha kya hogi? aap ki is rachna per badhayi

shobha का कहना है कि -

मिश्र जी
आपकी भाषा को नमन । किन्तु आप भी बहुत कुछ चाहकर कुछ खास नहीं कह पाए ।
किन्तु आपकी संस्कृत निष्ठ हिन्दी ने बहुत कुछ कह दिया । बधाई
तपन जी
आपने हिन्दी की वेदना को बहुत अच्छा पहचाना है । हिन्दी का सन्देश भी आपने पहुँचाया ।
अति सुन्दर । बधाई ।
रंजना जी
आपने तो हिन्दी दिवस को नया रंग ही दे डाला । आज की तसवीर उतार कर रख दी ।
अच्छा लगा पढ़कर । बहुत-बहुत बधाई ।

पंकज का कहना है कि -

हिन्दी -दिवस पर आप सब को बधाई।
'जहाँ चाह वहाँ राह'--निश्चित रूप से यदि हम सभी हिन्दी के विकास में लग जाएँ तो हो कर रहेगा।

शोभा जी की कुछ पंक्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण है।
"किन्तु एक विद्यार्थी ने
झटके से पूछ लिया था --
क्या आगे काम आएगी ?
नौकरी दिलवाएगी ?"

कहावत है ---भूखे भजन न होय गोपाला।

मैंने किसी स्थान पर पढ़ा था कि जितनी यूरोप की कुल पढ़ी-लिखी आबादी है उससे कहीं अधिक संख्या है स्नातकों की भारत में।
लेकिन मजे की बात है कि मुट्ठी भर यूरोपियनों की भाषाएँ पूरी दुनिया में आगे हैं, उनका ही ज्यादा सम्मान है।
कारण समझ में आता है, वो है उनका आर्थिक विकास।
देखिये ना, भारत के हिन्दी-भाषी राज्यों की क्या हालत है।
जब तक इस तरफ ध्यान नहीं दिया जायेगा समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आह...!!!
काव्य-पल्लवन को पढ़कर यही शब्द निकला दिल से। मैं बहुत हद तक अवनीश जी से सहमत हूं कि लिखा बहुत गया, बस कविता ही नहीं लिखी गई।
मेरा निवेदन है कि यदि यहाँ-वहाँ भटकते पृथक-पृथक विचारों को ही प्रकाशित करना है तो इस स्तम्भ को काव्य-पल्लवन का नाम न दिया जाए, विचार-पल्लवन ही कहा जाए।
ऐसा नहीं है कि सबने बुरा लिखा। कुछ कविता के बहुत पास तक भी पहुँचे। विशेषकर सभी कवयित्रियों ने औरों से बेहतर लिखा है। इसके लिए शोभा जी, रितु जी, दिव्या जी, रंजना जी और अनुराधा जी हल्के से धन्यवाद की पात्र हैं। निखिल जी ने भी ठीक लिखा, बस एक पंक्ति का औचित्य मेरी समझ में नहीं आया, मैं उनसे अर्थ जानना चाहूंगा।
दिखे हैं मीत लश्कर में,
इसका अर्थ तो यही हुआ ना कि मित्र किसी सेना या दल में दिखे हैं, यह यहाँ क्यों, कृपया शंका का समाधान करें।
अजय यादव जी ने भी औसत लिखा।
कवि कुलवंत सिंह जी- अतिसाधारण तुकबन्दी, जो कविता कदापि नहीं लगती।
महेन्द्र मिश्रा जी- कविता के बारे में क्या कहा जाए? वैसे एक निवेदन है कि कुछ लिखते, तो एक बार पहले खुद तो पढ़ लेते।
आप लिखते हैं- पर न कहता नमक हलाल न होना

क्या आप को पता है कि नमक हलाल का अर्थ क्या है?

सजीव जी, आपकी कविता एक बार कविता होने लगी थी, लेकिन फिर कहीं दूर चली गई।

....राजीव जी, पूरे काव्य-पल्लवन में सबसे अधिक निराशा आपको पढ़कर हुई। जिस दर से सबसे अधिक आशा होती है, वहीं से खाली हाथ मुँह लटकाकर लौटना पड़े तो ऐसा ही होता है।

फिर से निवेदन है कि इससे बहुत बेहतर होता कि हिन्दी पर विचार-पल्लवन ही प्रकाशित किया जाता।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

आदरणीय शोभा जी !
आपकी प्रतिक्रिया के आगे सदैव सिर नमन को झुकता है. मैं स्वयं क्षमा पार्थी हूं सभी मित्रों से. मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूं कि इस बार मेरा ध्यान मात्र हिन्द युग्म के विषय पर ही अधिक रहा है. शेष मैंने जो भी लिखा है पूरी इमानदारी से स्वीकार करता हूं कि यह मेरा पत्र हो सकता है मित्रों के बीच का निवेदन हो सकता है किन्तु कविता तो नहीं ही है. अब और स्पष्टीकरण न देकर बस शैलेष जी सहित मैं आप सब मित्रों से निवेदन करना चाहता हूं कि मैं अपने हिन्द युग्मीय मित्रों के लिये अपनी कवितायें कहां भेजूं. नियमतः प्रतियोगिता के नाम पर मेरा कविता भेजने का मार्ग अवरूदध हो चुका है. शेष हिन्दी दिवस पर क्षमायचना एवं खेद के साथ मेरी यह कविता यहां टिप्प्णी में प्रस्तुत है. अब यह माननीय नियंत्रकों पर आधारित है कि वह इसे इसका यथोचित स्थान दे सकें

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि

प्रणमामि शारदे्! प्रणमामि
प्रणमामि शारदे्! प्रणमामि
हे! आर्यावृत हे! भरत् पुत्र
हे! बल्मीकि हे! कालिदास
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि

प्रणमामि ताण्डव सिंहनाद
प्रणमामि महाकाली निनाद
प्रणमामि शारदे् सप्तनाद
प्रणमामि काव्यरस सिन्धुनाद
प्रणमामि भरत् भू परम्परा
ॠषियों की पावन महाधरा
षट्ॠतुओं ने पाँखें खोलीं
मेघों ने अद्भुत रूप धरा
प्रणमामि प्रेरणे! प्रकृतिदेव्
तन्त्री के तार छेडते हो
'सम्मोहित' सिन्धु मनीषा से
हे! शारदेय शत् शत् प्रणाम
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि

पुनश्च स्नेहादर सहित
आपका
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

तपन शर्मा का कहना है कि -

मुझे इस अंक का बेसब्री से इंतज़ार था। जब पता चला था कि इस बार का विषय "हिंदी" है तो मैंने सोचा कि काफ़ी अधिक कवितायें प्रकाशित होंगी। पर इस बार केवल १४ कवितायें ही शामिल हो पायीं। इससे मुझे बहुत झटका लगा।
अवनीश जी और गौरव जी की बात से मैं बिलकुल इत्तफ़ाक नहीं रखता। मुझे लगता है कि शब्द अथवा काविता से आप अपने विचार ही दूसरों तक