अच्छा है कि लोगों का रुझान ग़ज़लों की ओर हुआ है और ये आज की भाग दौड़ वाली जिन्दगी में ज़रूरी भी है कि सुकून का कुछ काम भी किया जाए
लोगों ने काफी प्रतिक्रिया दी है पिछली कक्षाओं को लेकर और अब ऐसा लग रहा है कि ये साथ जम रहा है । यूनि ग़ज़ल शिक्षक के रूप में काम करते हुए पहले तो मुझे कुछ झिझक हो रही थी और ऐसा लग रहा था कि पता नहीं मुश्किल काम को कोई सीखना चाहेगा भी या नहीं । और वो भी इसलिये कि जब बिना व्याकरण के ज्ञान के ही शायर माना जा रहा है तो फिर ज़रूरत ही क्या व्याकरण को सीखने की ।
दरअसल में ग़ज़ल ध्वनि का खेल है पूरा का पूरा ग़ज़ल का काम जो है वो वैज्ञानिक आधार पर चलता है । वैज्ञानिक आधार का मतलब ये है कि ग़ज़ल को ध्वनि पर रचा जाता है । और आपके मुंह से निकलने वाले उच्चारण पर ही सारा सब कुछ निर्भर रहता है । अगर हम हिंदी के छंदों की बात करें तो वहां पर मात्राओं का खेल है वहां पर उच्चारणों का उतना महत्व नहीं है जितना मात्राओं का है । पर ग़ज़ल तो केवल और केवल ध्वनि पर ही चलती है । आपने क्या उच्चारण किया उस पर ही निर्भर करता है कि मात्राएं क्या होगी । गज़ल में ही ऐसा होता है कि हम दीवाना भी कहते हैं और कभी दिवाना भी कहते हैं । हम दीवार भी कहते हैं और कभी दिवार भी कहते हैं । ये जो कुछ भी हो रहा है ये केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि उच्चारण की सुविधा के कारण ये है । ध्वनि विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है ग़ज़ल । यहाँ पर मात्राएँ आपके स्वर से निर्धारित होती हैं । हालाँकि हिन्दी छंद की तरह से यहां पर भी लघु और दीर्घ दो प्रकार की मात्राएं होती हैं पर यहां पर ये स्वतंत्रता होती है कि आप दो लघु को मिलाकर अपनी सुविधा से उसे एक दीर्घ के रूप में ले सकते हैं ।
ये पूरी बात जो मैंने कही इसको रिफरेंस के रूप में याद रखें आगे आने वाले समय में हम बार-बार इसका उपयोग करेंगें ।
चलिये कुछ और बातें की जाएं आज
रुक्न :- अगर पूरे शेर को पाजेब माना जाए तो उस पाजेब में लगे हुए छोटे छोटे घुंघरू रुक्न हैं इन रुक्नों से मिलकर ही शेर बनता है । अब रुक्न पर आने से पहले हम ये जानने का प्रयास करें कि रुक्न पैदा कहां से हुआ । दरअस्ल में लघु या दीर्घ मात्राओं का एक निश्चित गुच्छा रुक्न कहलाता है । जैसे एक पुराना गीत है मुहब्ब्त की झूठी कहानी पे रोए इसको अगर देखा जाए तो इसमें तीन जगह विश्राम आ रहा है मुहब्ब्त----की झूठी----कहानी-----पे रोए । आप अब रुक-रुक कर के पढ़ें जहां पर मैंने डेश लगाऐं हैं वहां पर विश्राम देकर पढ़ें । आपको भी लगेगा कि हां ऐसा ही तो है विश्राम तो आ ही रहा है । ये जहां पर विश्राम आ रहा है वास्तव में वहां पर एक रुक्न पूरा हो रहा है । अब एक काम करें छोड़ दें मुहब्ब्त की झूठी कहानी पे रोए को और ये देखें ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला । अब एक काम करें बार बार नीचे की पंक्तियों को पढ़ें बार बार
मुहब्ब्त----की झूठी----कहानी-----पे रोए
ललाला----ललाला----ललाला----ललाला
बार बार पढ़तें रहें तब तक जब तक आपको ये न लगने लगे कि अरे दोनों में तो ग़जब का साम्य है । साम्य ये है कि दोनों का वज़्न एक ही है वज़्न वो क्या बला है । सब्र करिये आगे उसकी भी जानकारी आ रही है ।
तो रुक्न कुछ निश्चित मात्राओं का एक समूह है । और हम ये जान लें कि मात्राओं से मिलकर बनते हैं रुक्न, रुक्नों से मिलकर बनते हैं मिसरे, मिसरों से मिलकर बनते हैं शेर और शेरों से मिलकर बनती हैं ग़ज़ल । मतलब रुक्न ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई मानी जा सकती है । ऊपर क्या है ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला अब ये ललाला क्या है ये मात्राओं का एक तय गुच्छा है जिसमें 122 का क्रम है एक लघु फिर दो दीर्घ मात्राएं आ रहीं हैं । ल:लघु-ला:दीर्घ-ला:दीर्घ ( मु:1, हब्:2, बत:2)
बहर :- रुक्नों का एक पूर्व निर्धारित विन्यास ही बहर होता है । पूर्व निर्धारित का मतलब जो कि पहले से ही तय है और आप उसमें कुछ भी परिवर्तन अपनी ओर से नहीं कर सकते हैं । जैसे ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला ये पहले से ही तय है और इसमें रुक्नों का विन्यास 122-122-122-122 है ये एक तय विन्यास है पूरी की पूरी ग़ज़ल इसी विन्यास पर चलेगी आप किसी शे'र में इसे बदल नहीं सकते हैं । ये जो तय विन्यास है ये ही बहर कहलाता है । अगर आपने किसी शे'र में विन्यास में फेर कर दिया तो आपका शेर बेबहर हो जाता है खारिज हो जाता है । अर्थात जान लें कि पूरी की पूरी ग़ज़ल उसी बहर पर चलेगी देखें उसी गाने का अंतरा न सोचा, न समझा, न देखा, न भाला बात वही चल 122-122-122-122 । हालंकि ये गीत है ग़ज़ल नहीं है पर ये बहर में है ।
वज़्न :- सबसे आवश्यक शै: है ये । वज़्न का मतलब तो वही है जो होता है भार । जैसे 122 का मतलब होता है एक लघु के बाद दो दीर्घ । अब ये हो गया वज़्न अगर किसी फल वाले से पूछेंगें तो कहेगा कि पांच किलो वज्न है । और ग़ज़ल वाले से पूछेंगें तो कहेगा कि ललाला वज्न है । तो ये जो हमारा ललाला है ये हमारा वज़्न है । और इस ललाला को अगर आपने कहीं पर लालाला या लालाल या लालला कर दिया तो मतलब ये है कि आपने डंडी मार दी रुक्न वज़्न से बाहर हो चुका है । मतलब ये कि पांच किलो होने से भी काम नहीं चलेगा पहले लघु है तो हर बार वो ही पहले रहे यहां पर जोड़ से काम नहीं चलता ।
प्रश्न उत्तर
शैलेश ने पूछा है
१) ग़ज़ल मै तुकांत शब जो है वो कुछ इस तरह से प्रयुक्त होता है
1-काफिया
२- काफिया
३- x
४- काफिया
५- x
६- काफिया
इसी तरह चलता रहता है
क्या इस से अलग तरह की भी कोई ग़ज़ल हो सकती है क्या?
उत्तर :- नहीं इससे अलग नहीं हो सकती है हां कुछ ग़ज़लें ऐसी होती हैं जिनमें मतला नहीं होता वो शेर से ही शुरू होती हैं ।
गुरु जी, एक बात पूछना चाहूँगा, ये जो तखल्लुस है, इसे मतले में क्या कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है, या सिर्फ़ पहले मिसरे में हो ऐसा जरूरी है ?
उत्त्र :- सजीव जी आपने मकते को मतला लिख दिया है सुधार कर लें तखल्ल़ुस मकते में आता है मतले में नहीं और हां मकते के किसी भी मिसरे में आ सकता है ।
एक सवाल -
क्या यह अनिवार्य है की "तखल्लुस " हो ही ?
-- अवनीश तिवारी
उत्तर:- अवनीश जी ज़रूरी नहीं के तखल्लुस हो ही । मैं स्वयं ही अपनी ग़ज़लों में मकता नहीं रखता मुझे वो परंपरा पसंद नहीं है ।









































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16 पाठकों का कहना है :
pankaj sir aaj rukan aur bahar ki jankari mili bahut achh a laga.gyan mein aur thodi si vrudhi ho gayi.sadar mehek
पंकज जी सार्थक जानकारी कोशिश रहेगी कि लिखते समय ध्यान रखा जाये।
पंकज जी,नमस्कार्……गज़ल के नैन नख्श बहुत खूबसूरती से बता रहे हैं आप ,हम सब सीख रहे हैं…बहुत शुक्रिया……
*बहुत ही रोचक और उपयोगी जानकारी आज की कक्षा में दी गयी है..
*बहुत ही सरल उदाहरण से आपने आज के विषय को समझाया है.
धन्यवाद.
पंकज जी ,हम तो इन बातों से पूरी तरह अनजान थे !आपके द्वारा बताई गई सभी बातें सरलता से समझ आ रही हैं !
एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ की क्या सभी ग़ज़लों मैं रुक्नों का विन्यास १२२-१२२-१२२ ही रहेगा अर्थात कोई भी ग़ज़ल हमेशा इसी बहर पर चलेगी इसमें कभी भी कोई बदलाव नही हो सकता ! इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ !धन्यवाद !
आपके आज के पाठ को पढ़ के जाना कि अभी तक बहुत सी बातों को सिर्फ़ इस लिए नही समझ पायी क्यूंकि उनकी भाषा कुछ समझ नही आई ..आपने बहुत सरलता से कई बातें समझा दी हैं .शुक्रिया !!
पंकज सर आज की इस विशेष जानकारी के लिए धन्यवाद
आलोक सिंह "साहिल"
धन्यवाद सभीका शिवानी जी मैंने एक उदाहरण दिया है कि ऐसा होता है । उसका मतलब ये नहीं है कि सभी ग़ज़लों में ऐसा ही होगा । आगे आगे सब कुछ आना है
पंकज जी,
आपके कारण हिन्द-युग्म का माहौल गज़लनुमा हो चुका है। इस बात की मुझे विशेष खुशी है। चलिए अब गज़ल के क्षेत्र में हम भी अपनी पकड़ बना पाएँगे। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
गुरुजी,
मात्राएँ गिनना भी सिखा दीजिए।
जी मैं भी गौरव की तरह पूचना चाहूँगा की मात्राएँ कैसे गिनी जाती हैं शयद ध्वनि से इसका ताल्लुक है, चंकी यह एक मशहूर गीत है, इसलिए समझ में आ रहा है पर किसी अनसुनी ग़ज़ल का उदाहरण देकर भी समझायें, जैसे अब इसी गीत में -
न सोचा ......न समझा ..... न देखा ..... न भाला,
तेरी आ........रजू ने...........हमे मा.. .... र डाला
क्या ये इस तरह से मात्र में आएगा, ?
मुहब्ब्त इस रुक्न का वज्न कैसे जाना जायेगा...
मु-१,हब-२,ब्त,२ यह समझ नही आया...
प्यार में वज्न है २,१ तो इसमे एसे क्यूँ ब्त का १ ही होना चाहिये...
माफ़ी चाहती हूँ गुरूदेव जरा स्पष्ट किजिये समझ नही आ रहा...
गुरु जी,
तकनीकी दुनिया की तमाम खूबियों की एक ख़ामी यह है कि हमारे जैसे आलसी शिष्य समय पर कक्षा में नहीं आते। वो यह मान लेते हैं कि कक्षाएँ कहाँ जायेंगी, जब मन तब जाकर उनमें बैठ जायेंगे।
आपके इस पाठ को पढ़कर यह लगा कि वज़्न को समान विन्यास का ही रखना होगा। मतलब 122, 221, 111, 121 की तरह के वज़्नों का रुक्न नहीं हो सकता?
न सोचा= 122
न भाला= 122
par sir jee
न समझा 1112 huaaa
न देखा 1112
hame ye choutaa A kai baar preshaan karta hai :)
jaise
safar=111 hai
par jab aap
samajhaa =22(1+1,2) kah rahe hai to
safar= 21(1+1,2) nahi ho sakta kya ?
kuch aur gyaan dijiye hame........ buddhi thodi kam hai :( hamari
yah ek achchha lekha tha, lekin aapne ise bara complex kar ke pesh kiya, kahiin iska kaaraN jnaan jharana to nahiin, mere comment par punh vichaar karein...
sir, ek kavita bhej raha hoo, self compose ki hui :-
pyar ek ehsaas hai, pyar ek viswas hai
pyar har ek saas hai, na toote wo aas hai
pyar mein hasna bhi hai to pyar mein rona bhi
pyar mein kuch paakar baut kuch khona bhi
pyar kabhi dard hai to pyar kabhi dawa bhi
pyar kabhi aag hai to pyar kabhi hawa bhi
pyar kabhi bhool hai to kabhi ek yaad bhi
pyar sune dil ki fariyaad bhi
pyar kantaaa hai to ek gulaab bhi
pyar ek rasili sharab bhi
pyar patit pyar pawan hai
pyar sada manbhaawan hai
pyar kabhi Ram to kabhi Ravan hai
pyar hamesha geet gavan hai
pyar ek karma hai, pyar ek dharma hai
pyar dukhti ragon mein ek naya marm (sparsh) hai
pyar ek maa mein hai to pyar ek Pita mein
pyar kuran mein hai to pyar Geeta mein
pyar Ek hindu mein to pyar musalmaa mein
pyar hi to dosto es sarein jahan mein
----------- Kaisi lagi ye kavita Sir..................
------------ from krishnaa
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