पाठ क्रमांक :- 7 'आ' और 'ई' के बाद बारी है 'ऊ' की जिसको काफिये में खूब प्रयोग किया जाता है ।
पाठ क्रमांक :- 7, दिनांक :- 5 फरवरी 2007, विषय :- काफिया में ऊ का प्रयोग
हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है
तुम्हीं कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने केहम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
ग़ालिब की ये ग़ज़ल शायद ग़ज़ल को समझने का सबसे अच्छा उदाहरण है । ग़ज़ल का मतलब होता है बातचीत करना । हालंकि इसको महबूबा के साथ बातचीत करना भी कहते हैं पर मेरे खयाल से तो इसको बातचीत करना ही कहा जाएगा । और इस ग़ज़ल को अगर देखा जाए तो ये सबसे अच्छा उदाहरण है बातचीत का कितनी आसानी के साथ ग़ालिब ने अपनी शिकायत दर्ज करवाई है 'हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है' मतलब कोई है जो हर बार उनसे कह रहा है कि चल चल तू है क्या । दूसरा मिसरा है 'तुम्हीं कहो के ये अंदाज़े ग़ुफ्तगू क्या है' अंदाज़े गुफ्तगू मतलब बात करने का अंदाज़ ।
बस इसी ग़ज़ल को ध्यान में रखकर ग़ज़ल कहें जितनी सादगी इस ग़ज़ल में है उतनी मुझे किसी और में नहीं मिलती है । इस मतले में सबसे बड़ी जो विशेषता है वो ये है कि इसमें बला की मासूमियत है, ग़ज़ब का भोलापन है और ये भोलापन, मासूमियत और सादगी ही तो ग़ज़ल की जान होती है ।
किसी ने कहा भी है
ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नज़ारों में
मुसलसल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में
तो बात वही है कि
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए
इसी ग़ज़ल को मैं ग़ज़ल के लिये भी मानता हूं कि अब ग़ज़ल को एक नइ हवा की ज़रूरत है और वो हवा ख़ुली हवा ही होगी ।
चलो तो आज बात करते हैं ऊ की ।
ऊपर ग़ालिब जी का जो शे'र मैंने लिया है वो भी ऊ का ही उदाहरण है । तू क्या है में ऊ की मात्रा बन रही है क़ाफिया और क्या है बन गया है रदीफ़ । तू, जुस्तजू, आबरू, रफू, जैसे क़ाफिये ग़ालिब साहब ने निकाले हैं । और शे'र तो ऐसे निकाले हैं कि क्या कहना
वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अजीज़
सिवाए बादाए-ग़ुलफा़मे-मुश्कबू क्या है
यहां जाने लें कि अज़ीज़ का मतलब होता हैं प्रिय और बहिश्त कहा जाता है स्वर्ग को, एक लंबा संयुक्त शब्द भी आया है बादाए-गुलफामे-मुश्कबू इसका अर्थ होता है ऐसी शराब जिसमें फूलों को रंग हो और कस्तूरी की सुगंध हो । मतलब कितनी आसानी से ग़ालिब कह रहे हैं कि स्वर्ग को भी अगर मैं पसंद करता हूं या वहां पर जाना चाहता हूं तो उसके पीछे केवल एक ही कारण है और वो ये कि वहां पर फूलों के रंग वाली और कस्तूरी की गंध वाली शराब पीने को मिलेगी वरना तो स्वर्ग में है ही क्या । अगर इस शे'र की व्याख्या की जाए तो पूरा दिन इस पर लेक्च्ार दिया जा सकता है । कितनी आसानी से स्वर्ग के होने और उसके लालच को शाइर ठुकरा रहा है ।
खैर आज तो ऊ का दिन है तो वापस ऊ पर ही आते हैं । ऊ के लिये भी नियम वही हैं जो ई के लिये थे । मगर एक बात जान लें कि ऊ काफिये के साथ शे'र बहुत अच्छे निकलते हैं और वो इसलिये कि ऊ के क़ाफिये बहुत सुंदर हैं । और अगर ध्वनि की बात की जाए साउंड की बात की जाए तो ऊ में नाद होता है ऊ ही आगे जाकर ओम बन जाता है । ऊ में जो नाद है वो उसको औरों से अलग कर देता है ।
ऊपर की ग़ालिब की ग़ज़ल एक तरह का उदाहरण है । चलिये अब एक और महान शाइर को दूसरे उदाहरण में देखते हैं
मिसरा कोई कोई कभू मौजूं करूं हूं मैं
किस ख़ुशसलीकगी से जिगर ख़ूं करूं हूं मैं
अब यहां पर बात कुछ बदल गई है पहले तो मैं आपको बता दूं कि ये बाबा-ए-गज़ल़ मीर तक़ी मीर साहब की ग़ज़ल है । मीर साहब जिनको पहला रोमांटिक शाइर कहा जाता है और कहा तो ये भी जाता है कि उनकी प्रेमिका कोई काल्पनिक सुंदरी थी ( याद करिये व्ही शांताराम की फिल्म नवरंग) ।
इस गज़ल में आप समझ ही गए हैं कि ऊ के साथ जो परिवर्तन हुआ है वो ये है कि ऊ के साथ अं की बिंदी संयुक्त हो गई है । ये बताने की तो अब ज़रूरत नहीं होनी चाहिये कि करूं हूं मैं यहां पर रदीफ है और ऊं हो गया है क़ाफिया ।
उठता है बेदिमाग़ ही हरचन्द रात को
अफ़्साना कहते सैकड़ों अफ़्सूं करूं हूं मैं
हरचन्द का अर्थ है हालांकि और अफ़्सूं कहा जाता है जादू को । आज कुछ मुश्किल गज़ल़ इसलिये उठाई है कि सबसे अच्छा उदाहरण ये ही है ।
तो बात वही ई की मात्रा वाली ही है कि अगर आपने क़ाफिये में ऊ पर अं की बिंदी भी लगा दी है तो जान लें कि ये अं की बिंदी अब आपकी ब्याहता हो गई आपको अब इसे हर हाल में निभाना ही है कष्ट दे तो भी ( विवाहित तो समझते ही होंगें )। और अगर अं की बिंदी नहीं ली है तो फिर कहीं नहीं लेना है
जैसे ऊपर मीर साहब ये भी कह सकते थे
अफ़्साना कहते सैकड़ों जादू करूं हूं मैं
जादू और अफ़्सूं का वज़्न समान ही है पर अं की बिंदी के कारण्ा जादू के पर्यायवाची अफ़्सूं को लाना पड़ा ।
चलिये वापस ऊ पर ही चलते हैं ये हमारी मात्राओं में आता है और इसीलिये इसको क़ाफिया बनाया जा सकता है ।
वो जिससे था चमन में कभी खूब रंगो बू
है आज वो गुलाब कहां जो था सुर्खरू
अब क्या हुआ है यहां पर यहां पर ये हुआ है कि रदीफ गोल हो गया है और केवल काफिया ही रहा गया है और काफिया भी क्या है केवल ऊ ही है । ये एक उदाहरण है कि किस प्रकार से ऊ का उपयोग किया जा सकता है काफिया बनाने में । अब इसी पर अगर शेर निकालने हों तो कुछ ऐसे होंगें
बेवा थी जो शहीद की उसकी कहूं मैं क्या
तूमको खबर नहीं है लुटी उसकी आबरू
और अगर मतले में ऊ के साथ अं की बिंदी आ गई हो कुछ ऐसे तो
अच्छा हो गर मिजाज तो इक बात मैं कहूं
जुल्फें तुम्हारी उड़ने लगीं अब तो चार सूं
अब क्या हुआ हुआ ये कि ऊ तो अब भी काफिया है पर अब वो सुहागन हो गया है उसके माथे पर बिंदी लग गई है । और अब आगे के सारे शेरों में आपको उसे सुहागन ही रखना है ।
तुमने सजा सुना तो दी मुझको है बेख़ता
बोलो तो इक हसीन गुनह मैं भी अब करूं
तो आज के पाठ के मुख्य बिंदू
1 ऊ को आप काफिया बनाते समय ध्यान रखें कि यदि उस पर बिंदी है तो पूरी ग़ज़ल में वो बिंदी के साथ ही आएगा
2 ऊ को दोनों ही प्रकार से उपयोग कर सकते हैं एक तो काफिया और रदीफ में या केवल काफिया में ।
आज से कुछ परिवर्तन हो रहा है और वो ये है कि अब से मंगलवार की कक्षा में पाठ हुआ करेगा और पूरे सप्ताह भर के प्रश्नों पर शुक्रवार की कक्षा में प्रश्नोत्तर खंड हुआ करेगा । वो इसलिये के अब कक्षा कुछ लम्बी हो रहीं हैं और प्रश्नोत्तर भी अधिक आने लगे हैं सो ऐसा करना पड़ रहा है । आज इसीलिये प्रश्नोत्तर नहीं लिये जा रहे हैं प्रश्न शुक्रवार को लिये जाएंगें ।आज आपके एक अच्छे सुझाव पर पाठ पर क्रमांक भी लगा दिया है जो प्रश्नोत्त्र पर भी लगेगा पर उसका क्रमांक अलग होगा । प्रयास ये करूंगा कि शुक्रवार की कक्षा के समय मैं जीमेल पर भी आनलाइन रहूं ( विद्युत मंडल ऐसा होने नहीं देगा ) ।









































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10 पाठकों का कहना है :
इस बार के कक्षा अच्छी रही |
धन्यवाद | पाढ़ को क्रमांक देना अच्छा हुया है |
गुरूजी, आप अपने उत्तर यंही पर दीजियेगा न की gmail पर | इससे हम सभी को बहुत सीखने लायक बातें पता चलती है |
--
अवनीश तिवारी
गुरूजी आज की कक्षा सच में बेहद अच्छी रही.| उ के बरे में बहुत नायब ग़ज़लों के साथ उद्धरण मिले |बहुत कुछ समझ में आया शुक्रिया |हम भी इस बात से सहमत है की आप प्रश्नों के उत्तर यही दे,ताकि हमे भी सिखने मिले.धन्यवाद |
पाठ ७ भई हो गया गुरू जी
सादर
हेम
आपकी कक्षा में हमेशा समय पर तो हाज़िर नहीं हो पाता परंतु वक्त मिलने पर सभी लेख पढ़ लेता हूँ. लोगों का गज़ल की बारीकियाँ सीखने की ओर जो रुझान है, उसे देखकर अच्छा लग रहा है. आपका समझाने का अंदाज़ भी बहुत सरल और आकर्षक है, इससे अपेक्षाकृत मुश्किल बातें भी आसानी से समझ में आ जातीं हैं. इस सिलसिले को आरंभ करने के लिये बहुत-बहुत आभार!
bahut khoob guru ji,
bahut badhia udaharan diye aaj aapne
ग़ालिब और मीर-तकी-मीर के गज़लों के माध्यम से आपने काफिये की जो शिक्षा दी है, वह मुझे बहुत हीं पसंद आया।
बधाई स्वीकारें।
-विश्व दीपक ’तन्हा’
subhan allah ,sach me hindi yugm me log bahut mehnat kar rahe hai.aapne kai bato ko badi saralta se samjhaya hai.
पंकज जी,
यह भी अच्छा रहेगा। सप्ताह में एक बार कक्षा और दूसरी बार शंका-निवारण, शायद यही ठीक तरीका है।
फिलहाल मुझे तो कोई शंका नहीं है :)
अभी विश्व पुस्तक मेले में व्यक्त हूँ। १० फरवरी के बाद आपके पाठ पर अभ्यास करूँगा तब शंकाएँ उत्पन्न होंगी।
बहुत अच्छी व्याख्या और पाठ.
धन्यवाद सुबीर जी.
इतना सरल ग़ज़ल के बारे में मुफ्त पाठ इंटरनेट पर हिन्दी में कहीं और उपलब्ध नहीं है.
शिक्षक सुबीर जी को इतने सरल तरीके से पाठ प्रस्तुत करने में बहुत मेहनत लगती होगी.इसलिए जो पाठक सिर्फ़ पढ़ कर बिना टिप्पणी दिए चले जाते हैं उन से अनुरोध है कम से कम अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर दिया करें.
आभार सहित.
प्रिय सुबीर जी को हार्दिक बधाइयां । हिंदयुग्म को इस प्रयास के लिए साधुवाद..। छंदशास्त्री श्री आर. पी. शर्मा महरिष जी ने अपनी पुस्तक ’गज़ल लेखन कला’ कुछ माह पूर्व भेंट की थी । उससे गजल लेखन सीखा है.. लेकिन कभी कभी छोटे छोटे संदेह उठ खड़े होते हैं..आशा है यहां निराकरण हो सकेगा..
काफिया के दो संदेह हैं...मतले में
१. ’कहता है’
’लगता है’
क्या यह काफिया+रदीफ बन सकता है ?
२. ’अखरता है’
’बिछड़ता है’
क्या यह काफिया+रदीफ बन सकता है ?
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