Thursday, January 31, 2008

काव्य पल्लवन जनवरी 2008






काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - बिजली

विषय-चयन - विवेक रंजन श्रीवास्तव

अंक - ग्यारह

माह - जनवरी 2008





जनवरी माह के काव्य पल्लवन का शीर्षक "बिजली" श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव द्वारा सुझाया गया था जिन्होंने इस विषय पर कविता के साथ साथ दो सुन्दर छायाचित्र भी भेजे हैं। छायाचित्रों समेत इस बार कुल 18 रचनायें प्राप्त हुईं। बिजली के तो कई प्रयाय हैं जैसे तड़ित, चपला, विद्युत, वज्राग्नि, गाज, सौदामिनी, दामिनी, हीर, शम्पा, अणुभा, आशनि, समनगा और चंचला इत्यादि, परन्तु इस काव्य पल्लवन के संदर्भ विशेष में बिजली (विद्युत) को ही कवियों ने लक्ष्य बनाया है.. और क्यों न हो ज्यादातर लोग उसी के सताये हुये हैं... तो कीजिये रसास्वादन इस बार के काव्य पल्लवन अंक का -



*** प्रतिभागी ***
| पंकज रामेन्दू मानव | विपिन चौधरी | गीता पंडित (शमा) | गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" | ममता गुप्ता |
| डॉ. नंदन | विनय के जोशी | संतोष शर्मा | सौमित्र बैनर्जी | दिवाकर मिश्र | विवेक रंजन श्रीवास्तव |
| प्रो सी बी श्रीवास्तव | शैलेश जमलोकी | सीमा गुप्ता | महक | शोभा महेन्द्रू |
| विश्व दीपक 'तन्हा' | छायाकार - श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव |


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~




बिजली से हमारे नाता काफी पुराना है,
हमारे पूर्वज आसमानी गरज से डरते थे
और बिजली की पूजा करते थे।

बिजली के कई कलात्मक रूप हैं
कही नकारात्मक तो कहीं सकारात्मक स्वरूप है
बचपन में आसमानी बिजली हमे बहुत लुभाती है
जवानी में षोडशी कन्या हमारे दिल पर बिजली गिराती हैं
बुढ़ापा आते-आते हमारी शारीरिक बिजली खत्म हो जाती है।
यानि बचपन से लेकर बुढ़ापे तक बिजली हमें कई रंग दिखाती है।

कहीं नाम का करंट, कहीं दाम का झटका है
कहीं वादे के एसी से जलता एक लट्टू लटका है
विकास के बांध से क्या बिजली बन पाएगी ?
कई अंधेरी बस्तियों में यही खटका है ।

सुबह से रिक्शा खींचती, बोझ ढोती भूख को
एक अदद रोटी से,बेरोज़गारी के अंधेर में भटकती पीढ़ी को
एक सुखद नौकरी से,
प्यासे को पानी से, मौज को रवानी से
बचपन को नादानी से, जोश को जवानी से
बिजली मिलती है,
इन छोटी-छोटी बातों से
ज़िंदगी की बत्ती जलती है ।

- पंकज रामेन्दू मानव




हम अँधेरे में रहने के आदी कभी नहीं थे
अखिरकार हमने रोशनी को खोजा
फिर उसका आधुनिकरण कर
उसे अपनें अनुकूल ढाल लिया

अब हाल यह है की
अक्सर बिजली को हमसे
और हमें बिजली से शिकायत रहती है

सच है, अब हम
बिजली के सताये हुये
पूरी तरह से बेबस इंसान हैं

पर यह भी उतना ही सच है
इस दुनियादारी में हर कदम पर
बिजली ने हमारा साथ दिया है

दुनियादारी के ये सारे
चमकिले साजो सामान
बिजली के ही सहारे हमें मिले हैं

एक सच यह भी है
सब पर इसका साझाँ हक नहीं है
बिजली ने गरीबो का नहीं,
हमेशा अमीरों का ही साथ दिया है

यकायक बिजली गुल होती है
तब हम बेबस हो जाते हैं
अंधेरा हमें कचोटता है हम
बिजली के दामन की ओर लपकते हैं

पर इतना आसान नहीं है
बिजली का सहज साथ
यह अब आसमान की तरह
बिलकुल साफ है

इस बिजली के पीछे हम
अपने जुगनूओं लाऊँ
की भीनी रोशनी को
भूल बैठे हैं

और क्या बतलाऊँ
इस बिजली की कहानी
डर है कहीं मैं
अपने समेटे हुये अँधेरे इस बिजली गाथा के
चक्कर में गवाँ न बैठूँ

वो अँधेरे जो बिजली के स्वाभिमान को
टक्कर देने के लिये मैनें बडी कोशिशो से बचा कर रखे हैं।

- विपिन चौधरी




उमड़-घुमड़ घनघोर - घटाएँ,
जब भी नील-गगन में छायें
बिजली की ले दीप्त ध्वजाएं,
दिग - दिगांतर में फहराएँ,
मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |
मेरे पिया, अभी ना आये, |

यूँ सारा सुनसान - सदन ये,
पर घन की आवाज सघन ये,
नित बादल घिर मुझे डराएं,
पी का संदेसा नहीं लाएं
मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |
मेरे पिया, अभी ना आये |

प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएं,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,
मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |
मेरे पिया, अभी ना आये |

- गीता पंडित (शमा)




हर तरफ उल्हास सा है गुमशुदा है तीरगी ...!!

तुम इसे कह दो सवेरा
स्वर्ग का आलोक कह दो
जो भी चाहो मुक्त हो तुम
एक पल मुझ में तो रह लो
तुम्हारी यादों की बिजली कौंध जाए जब कभी भी

हर तरफ़ उत्साह सा है.गुमशुदा है तीरगी !

मन तपस्वी सा सहज हो
धुंध में भी देखता है
एक कण भी ज्योतिका का
सहज ही सहेजता है .
बिहंसी बिजुरी सी तुम्हारी मिलेगी जब भी कभी

हर तरफ़ संन्यास होगा दूर होगी तीरगी !!


- गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"




हाय, ये बिजली फिर बिजली गिरा कर चली गई,
सुख चैन मेरा लूट कर घंटो न आने को चली गई !
नाश्ता, प्रेस, कपड़े,बर्तन, कितना सारा काम था ?
पर यह तो हाथ पर हाथ धर मुझे बिठा कर चली गई!
उद्योग, फैक्ट्री, बैंक, बाज़ार, टी.वी, कंप्यूटर और व्यापार
सबका कर चक्का जाम, ब्रेक लगा कर चली गई!
धारा से गगन तक प्रभुत्व है जिसका,उस मानव को अशक्त बना कर चली गई!
प्रिय, तू है तो जीवन मे गति है, नही तो सब स्थिर है, जंगल है !
आजा, राजदुलारी आजा .....क्यों तरसा कर चली गई?

- ममता गुप्ता




मैं कुदरत की बेटी थी
अलसाई सी लेटी थी
आसमान के सीने में
धरती के गर्भ में
अतल नील सागर में
हवाओं के कण-कण में
अपने उद्यम से
तुमने मुझे जगाया
चंचला बनाया
मेरी शक्ति को साधने के लिए
तुमने अनंत का सीना झाँका
हवाओं को बाँधा
सागर की गहराई नापी
धरती के उमस अंधेरे से
मुझे बाहर निकाला
माना मैं शक्ति विनाशी हूँ
मैं नहीं किसी की दासी हूँ
मैं चपला हूँ,मैं दामिनी हूँ
सारे जग की मैं स्वामिनी हूँ
पर मानव मैं तुमसे हारी हूँ
मानवता पर खुद को वारी हूँ
तुम मेरा उपयोग करो
सुरक्षा के साथ भोग करो

(नियंत्रित उपयोग का वरदान है)

- डॉ. नंदन




बिजली पर कुछ क्षणिकाएँ :-

(१)

शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी

(२)

महाभारत
की कथा में अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई

(३)

बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?

(४)

केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से

(५)

एकाकार
राजनीति
और
बाहुबली
मानों
करंट
और
बिजली

- विनय के जोशी




बिजली चोरी का अपराध राष्ट्र द्रोह कहलाय !!

बिजली चोरी ना करो राखो अपना मान
क्षुद्र स्वार्थ में राष्ट्र का क्यों करते नुकसान !!

पकड़ गये तो जुर्माना और सजा हो सकती है
गये ना पकड़े तो भी दुर्घटना घट सकती है !!

जागो जागो माता बहनो जागो सब इंसान
भारत की चहुँमुखी प्रगती में बिजली है वरदान !!

खुद भी चोरी ना करो और करे ना कोय
बिजली चोरी का अपराध राष्ट्र द्रोह कहलाय !!

- संतोष शर्मा




बिजली एक कल्पना ऐसी
तड़ित रूप में नभ में रहती
जब उत्पादित हो कृत्रिम यह
तारों की लहरों पर बहती

इन तारों के कठिन जाल में
बिजली रानी यूँ इठलाती
मानो सारा मानव जीवन
है इसका आधार बताती

बिजली ऐसी आवश्यकता है
जिससे नहीं चुरा सकते मुख
यदि कभी खो जाये यह तो
बढ़ जाते है धरती पर दुख

- सौमित्र बैनर्जी




स्कूटर से दोनों आ रहे थे पाँच किलोमीटर दूर दूसरे गाँव से
एक खासमखास की बेटी के जन्मदिन की दावत थी ।
कोई चारा नहीं बचा बरगद की शरण लेने के सिवा,
क्योंकि पहिए रपट रहे थे,
सड़क भी पतली थी,
अँधियारी रात सी घटा और मूसलाधार बारिश ।
साथ में पत्नी,
घनी घटाएँ,
बरसात,
चमकती बिजली,
वह गुनगुना उठा वह गाना
जो अभी सुनकर आया था समारोह में,
डेक पर बज रहा था- दिल पे बिजली ऐसी गिराई...

हाय क्या विधाता को इसी क्षण जुबान को सच करना था ?
वह पूर्वी आकाश में चमका आलोक पुञ्ज
समा गया पत्नी के सीने में,
आस-पास की ज़मीन को भी थर्राता हुआ,
हाय तक न कहने देता हुआ,
गाने की अगली लाइन सच करता हुआ-
जाँ मेरी ले उड़ी...

कैसे लोग उन बातों को भी मजाक बना लेते हैं
जिनका सामना करने की भी हिम्मत नहीं होती ?
क्या होता है बिजली गिरना ?
क्या होता है जाँ ले उड़ना ?

अब वह पत्नी को बाँहों में भरे जड़वत्
ठिठका बैठा था
न रो रहा था
न हिल रहा था
कौन कह सकता है कि बिजली उसके दिल पर गिरी या इसके दिल पर गिरी ?
कौन कह सकता है कि जान उसकी गई या इसकी गई ?

- दिवाकर मिश्र




शक्ति स्वरूपा ,चपल चंचला ,दीप्ति स्वामिनी है बिजली ,
निराकार पर सर्व व्याप्त है , आभास दायिनी है बिजली !

मेघ प्रिया की गगन गर्जना , क्षितिज छोर से नभ तक है,
वर्षा ॠतु में प्रबल प्रकाशित , तड़ित प्रवाहिनी है बिजली !

क्षण भर में ही कर उजियारा , अंधकार को विगलित करती ,
हर पल बनती , तिल तिल जलती , तीव्र गामिनी है बिजली !

कभी उजाला, कभी ताप तो, कभी मशीनों का ईंधन बन जाती है,
रूप बदल , सेवा में तत्पर , हर पल हाजिर है बिजली !

सावधान ! चोरी से इसकी , छूने से भी , दुर्घटना घट सकती है ,
मितव्ययिता से सदुपयोग हो , माँग अधिक , कम है बिजली !

गिरे अगर दिल पर दामिनि तो , सचमुच , बचना मुश्किल है,
प्रिये हमारी ! हम घायल हैं, कातिल हो तुम, अदा तुम्हारी है बिजली !

सर्वधर्म समभाव सिखाये , छुआछूत से परे तार से , घर घर जोड़े ,
एक देश है ज्यों शरीर और, तार नसों से , रक्त वाहिनी है बिजली !!

- विवेक रंजन श्रीवास्तव




अग्नि , वायु , जल गगन, पवन ये जीवन का आधान है
इनके किसी एक के बिन भी , सृष्टि सकल निष्प्राण है !

अग्नि , ताप , ऊर्जा प्रकाश का एक अनुपम समवाय है
बिजली उसी अग्नि तत्व का , आविष्कृत पर्याय है !

बिजली है तो ही इस जग की, हर गतिविधि आसान है
जीना खाना , हँसना गाना , वैभव , सुख , सम्मान है !

बिजली बिन है बड़ी उदासी , अँधियारा संसार है ,
खो जाता हरेक क्रिया का , सहज सुगम आधार है !

हाथ पैर ठंडे हो जाते , मन होता निष्चेष्ट है ,
यह समझाता विद्युत का उपयोग महान यथेष्ट है !

यह देती प्रकाश , गति , बल , विस्तार हरेक निर्माण को
घर , कृषि , कार्यालय, बाजारों को भी ,तथा शमशान को !

बिजली ने ही किया , समूची दुनियाँ का श्रंगार है ,
सुविधा संवर्धक यह , इससे बनी गले का हार है !

मानव जीवन को दुनियाँ में , बिजली एक वरदान है
वर्तमान युग में बिजली ही, इस जग का भगवान है !

कण कण में परिव्याप्त , जगत में विद्युत का आवेश है
विद्युत ही जग में , ईश्वर का , लगता रूप विशेष है !!


- प्रो सी बी श्रीवास्तव




बिजली,
एक शब्द-हिंदी का
जिसका ख्याल मन मै आते ही
एक कम्प्कपाहट का होता है
आभास

बिजली,
एक रूप-उस ऊर्जा का
जो न पैदा होती है न नष्ट
बस बदल देती है अपना
आचरण

बिजली
एक ध्योतक -उजाले का
जो रोशन कर दे जिंदगी
बिना जिसके लगती है जो
अधूरी

बिजली
एक वरदान- भगवान का
जिसके ज्ञान से इंसान ने
कर दी है हर बाधा
आसान

- शैलेश जमलोकी




खो ना दूँ तुझको इस डर से तुझे कभी मैं पा न सका ,
चाहता रहा शीद्त्त से मगर तुझे कभी जता ना सका.

वीरान आँखों के समुंदर मे अपने आंसुओं को पीता रहा ,
दिल के दर्द की एक झलक भी मगर तुझे दिखा ना सका .

तेरा ख्याल बन कर बिजली और एक तूफान मुझे सताता रहा ,
इश्क मे जलने का सबब मगर तुझे कभी समझा ना सका .
तू बदनाम न हो जाए , मैं जमाने मे गुमनाम सा जीता रहा
लबों पे नाम तो था पर आवाज देकर तुझे बुला ना सका .

तु कभी गैर की न हो जाए ये ख्याल हर पल मुझे डराता रहा
शिकवा आज भी है इस डर से तुझे कभी अपना भी ना सका

उपर वाला बस बेदर्द हो गम की "बिजली" मुझपे ही गीराता रहा,
तुझसे जुदा होके भी अपना आशियाँ झुलसने से मैं बचा ना सका ……

- सीमा गुप्ता




नीले नभ की छुपी नीलाई
शामल घटाए उस पर छाई
बदरा उमड़ घूमड़ कर आई
अपनी संगिनी को रहे पुकार
इठलाती,बलखाती थिरकत ताल
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

अपनी आने की आहट बताए
प्रकाश चमकती लकीरे बिखराए
खुश होती वो जब ये देखती
इंसानो में अब भी बसता प्यार
बदरा से करती इश्क़ इज़हार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

कोई सृजन पीड़ित नज़र आए
त्रिनेत्र को गहरी नींद से जगाए
करती उनके संग तांडव नृत्य
जब तक असत्य को ना जलाए
ख़त्म करना चाहे धरासे अत्याचार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

सत्य,अहिंसा विजयी हो जाए
सब के संग तब वो जश्न मनाए
हरित क्रांति का संदेसा पहुँचाती
बदरा से कहती अब बरसाए
शीतल बूँदो की मधुरस फुहार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

चाहे जितना हो उन में अंगार
बिजली नभ का गहना शृंगार
बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
मिलकर दोनो करे सपने साकार
जीवन को दिलाए नया आकार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |


- महक




प्रतिपल आती -जाती
बिजली से दुःखी हो
हमने बिजली दफ्तर में
गुहार लगाई
विद्युत अधिकारी ने
लाल-लाल आँखें दिखाई
अजीब हैं आप--
हम पर आरोप लगा रहे हैं
अरे हम तो आपका ही
खर्च बचा रहे हैं
इस मँहगाई में
बिजली हर समय आएगी
तो बिजली का बिल देखकर
आप पर------
बिजली नहीं गिर जाएगी ?

बिजली की किल्लत से वो
जरा नहीं घबराते हैं
परिवार को अपने
आस-पास ही पाते हैं
टी वी और कम्प्यूटर को
हँसकर मुँह चिढ़ाते हैं
क्योकिं –
जब भी श्रीमान जी
दफ्तर से आते हैं
बिजली को हरदम
गुल ही पाते हैं

- शोभा महेन्द्रू




देखो! हुजूम बेईमानों के कितने हैं घनघोर हुए,
बड़े-बड़े उद्योगपति भी जब बिजली के चोर हुए ।

बिजली-
जिसके आने से रात चमक-सी जाती है,
फुटपाथ से बिजली-
धूप-दीप गरीब-गुनबे को दिखलाती है,
जीना सिखलाती है,
बिजली-
जिसके जोर-शोर से गाँव-गाँव रौशन हुए,
जगमग बिजली-
हर मौसम ही लोगों का दर्द घटाती है।

क्या मिलता है उनको, जो इसके कमर-तोड़ हुए,
बड़े-बड़े उद्योगपति भी जब बिजली के चोर हुए ।

बिजली-
जिसकी चहल-कदमी जीवन का पर्याय बनी,
बिजली गली-मुहल्ले में-
माँ-बहन की हया की धाय बनी,
जीने का उपाय बनी,
बिजली-
सुख-समृद्धि बटोर हेल-मेल बढ़वाती है,
हर पल बिजली-
घर-घर बँटकर खुशियों का एक निकाय बनी।

ऐसी बिजली से जाने क्यों,अपने हीं यूँ कठोर हुए,
बड़े-बड़े उद्योगपति भी जब बिजली के चोर हुए ।

बिजली-
तकनीकी दुनिया में एक सबल उदाहरण है,
पवन-चक्की ऒ' पनबिजली-
और भी कई हज़ार ही रूप-धन हैं,
कई सारे ही अवतरण हैं,
बिजली-
बेचारी! हरेक जन्म दूजे-खातिर जल जाती है,
सचमुच बिजली-
इस दुनिया में सूरज के ही दोउ नयन हैं।

बोलो कब-तक सहना होगा, इसको यूँ ही अघोर हुए,
बड़े-बड़े उद्योगपति भी जब बिजली के चोर हुए ।

*अघोर=भगवान शंकर

- विश्व दीपक 'तन्हा'








छायाकार - श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव



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68 पाठकों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

" बिजली मानो तो एक शब्द, जियो तो एक जरूरत, सुनो तो एक कड़क आवाज, देखो तो एक चमक, सोचो तो एक अजूबा, और महसूस करो तो शायद एक गम भी....." ये तो वही वाली बात हुई न एक नाम और इतने अर्थ. यहाँ आज बिजली के इतने रूप प्रस्तुत हुये हैं की यकीन ही नही हो रहा की बिजली को इस तरह से बखान किया जा सकता है.
ये भी अपने आप मे एक अजूबा ही है, आप सब कवी मित्रों को बहुत बधाई जो एक से बढ़ कर इस विषय पर कवीता प्रस्तुत की और एक इतिहास बना डाला.
"With Regards"

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

रचनाएँ अच्छे है |
छाया चित्र भी |
सभी को बधाई |

आओ बिजली बचाई

अवनीश तिवारी

आलोक शंकर का कहना है कि -

gita ji,
Your poem is great.

pankaj ramendu का कहना है कि -

बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?

विनय जी आपकी यह क्षणिका बहुत ही उम्दा है.. मज़ा आ गया .. आपको मेरी ओर से बधाई...

mehek का कहना है कि -

bijli ke itne alag alag roop ko padhkar behad kushi hui.sari rachanaye bahut sundar hai,khas kar skhanikayen behad khubsurat.sab ko badhai.

रंजू का कहना है कि -

बिजली के इतने रंग दिखे हर रचना में यहाँ .बहुत अच्छा लगा इस विषय पर यूं अलग अलग ढंग से पढ़ना ,सबका लिख अहि बहुत अच्छा लगा .विनय जी की यह विशेष रूप से पसंद आई
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?

गीता जी की लिखी यह पंक्तियाँ अच्छी लगी

प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएं,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,

शैलेश जी की यह अच्छी लगी पंक्तियाँ

बिजली
एक ध्योतक -उजाले का
जो रोशन कर दे जिंदगी
बिना जिसके लगती है जो
अधुरी

शोभा जी ममता जी ,की व्यंग करती हुई रचना अलग सी है ..बाकी सब भी अपने अपने अंदाज़ में लिखी गई बहुत अच्छी है ..बधाई एक और सफल अंक के लिए !!

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

कौन कहता है बिजली आकाश में होती है..
हिन्द-युग्म पर आकर देखो
बिजली एकदम पास में होती है..
हर आम में होती है हर खास में होती है..
हर शब्द में लय में एहसास में होती है..
हर रंग में होती है हर लिबास में होती है..
पाठकों की आलोचना में, शाबाश में होती है..
हमने सुनते है तो हम भी फूल कर कुप्पा हो जाते हैं
कि...
कभी कभी बिजली अपनी भी बकवास में होती है..
कहते है इंसान में माइट्रोकोंड्रिया बिजली घर है..
और बिजली ही चालक है ऊर्जा है..
बिन बिजली मानव जंग लगा सा पुर्जा है..
मेरे गाँव का एक किस्सा है..
लालच में बिजली के तार चुराने खम्बे पर चढ़ा
देखते ही देखते जमीन पर कबूतर सा आ पड़ा
ट्रांसफॉरमर फुका और गाँव की बिजली हो गयी गुल
पता चला जो बिजली चुराने चला था
उसी की भैंस अंधेरे में गयी खुल..
पैरों से खुदाई की तब होश आया..
फिर अपनी करनी पर शरमाया..
सो भैया इस जनम की करनी का फल
यही मिल जाता है..
भगवान जी के पास भी काम बहुत है..
अगले जन्म के लिये कैरी फॉरवर्ड नही करते हैं
ब्रह्म विधेयक पास हो गया है..
सो यहाँ का हिसाब यहीं करते हैं..

- सभी की कवितायें लाजवाब..
बहुत बहुत बधाई हो साब..

sahil का कहना है कि -

१.रामेंदु जी, बिजली के कुछ अनछुए पहलुओं को आपने अपनी कविता मी उकेरा है,अच्छा लगा.
सुबह से रिक्शा खींचती, बोझ ढोती भूख कों
एक अदद रोटी से,बेरोज़गारी के अंधेर में भटकती पीढ़ी को
एक सुखद नौकरी से,
प्यासे को पानी से, मौज को रवानी से
बचपन को नादानी से, जोश को जवानी से
बिजली मिलती है,
इन छोटी-छोटी बातों से
ज़िंदगी की बत्ती जलती है ।
हालांकि शुरू मी थोड़ा कमजोर दिखे पर अन्तिम पंक्तियों से कविता मी जान फूंक दी.बधाई हो.
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

२.अब हाल यह है की
अक्सर बिजली को हमसे
और हमें बिजली से शिकायत रहती है
विपिन जी इन पंक्तियों से आपने बिजली के यथार्थ कों प्रस्तुत करने का प्रयास किया. शैली तो दुरुस्त रही पर विचारों में कसाव का अभाव खला.
आलोक सिंह 'साहिल"

sahil का कहना है कि -

३. गीता जी, बहुत ही अच्छे अंदाज में आपने बिजली कों बयां किया.कविता की शुरुआत में लगा कि "पन्त" जी की "ग्राम्या" पढ़ रहा हूँ.अच्छी प्रस्तुति.
बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

हर तरफ़ उत्साह सा है.गुमशुदा है तीरगी !
गिरीश जी बहुत ही शानदार पंक्ति है.
अंत मे
हर तरफ़ संन्यास होगा दूर होगी तीरगी !!
का होना कविता की मरकता कों बढ़ा देता है.
बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

ममता जी,आपकी कविता पढ़कर बरबस हँसी आ गई.आपने तो बिजली की महिमामंडन कर डाला अच्छा है.घर गृहस्थी से लेकर सामाजिक जीवन तक सब जगह बिजली की अनिवार्यता कों सही अंदाज मे उकेरा है.
प्रिय, तू है तो जीवन मे गति है, नही तो सब स्थिर है, जंगल है !
आजा, राजदुलारी आजा .....क्यों तरसा कर चली गई?
बहुत खूब
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

नंदन जी बहुत ही जोरदार प्रस्तुति है,मजा आ गया.सच कहूँ तो आपकी कविता मे मीन-मेख निकालने का साहस नहीं जुटा पाया.क्या खूब कहा-
माना मैं शक्ति विनाशी हूँ
मैं नहीं किसी की दासी हूँ
मैं चपला हूँ,मैं दामिनी हूँ
सारे जग की मैं स्वामिनी हूँ
पर मानव मैं तुमसे हारी हूँ
मानवता पर खुद को वारी हूँ
तुम मेरा उपयोग करो
सुरक्षा के साथ भोग करो
बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

विनय जी आपकी सारी क्षणिकाएँ पढीं पर ऐसी कोई एक क्षणिका नहीं रही जिसका अलग से उल्लेख किया जा सके क्योंकि सभी की सभी अपने आप में सशक्त रहीं पर चौथे क्षणिका ने अलग ही रूप धारण कर रखा था
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
बेहतरीन...........
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

संतोष जी, आपने दोहे के माध्यम से बिजली चोरी के विषय कों उठाने का अच्छा प्रयास किया है, परन्तु आपने बिजली विषय कों बहुत ही संकरे दायरे मे समेट दिया .
खैर,बहुत दिनों बाद दोहे पढने कों मिले,धन्यवाद
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

सौमित्र जी ठीक ठाक रचना पर दिल मे नहीं उतर पाई,गहराई का घोर अभाव.शायद बाल उद्यान के वास्ते लिखी गई कविता.खैर आपने बिजली के उस रूप कों छुआ जो मेरे माफिक थी, इसलिए बधाई हो.
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

दिवाकर जी हिला देने वाली कविता विशेषकर ऐ पंक्तियाँ-
कौन कह सकता है कि बिजली उसके दिल पर गिरी या इसके दिल पर गिरी ?
कौन कह सकता है कि जान उसकी गई या इसकी गई ?
बहुत ही अच्छे अंदाज मे लिखी गई कविता,मजा आ गया.
बहुत बहुत शुभकामना
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

विवेक जी,इसबार चूँकि विषय आपके द्वारा सुझाया गया था तो मुझे आपसे बहुत ही ज्यादा उम्मीदें थी,खुशी हुई आप मेरे उम्मीदों पर काफी हद तक खरे उतरे.बिजली के तकरीबन हर रूप कों छूने का अच्छा प्रयास.बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

विवेक जी,इसबार चूँकि विषय आपके द्वारा सुझाया गया था तो मुझे आपसे बहुत ही ज्यादा उम्मीदें थी,खुशी हुई आप मेरे उम्मीदों पर काफी हद तक खरे उतरे.बिजली के तकरीबन हर रूप कों छूने का अच्छा प्रयास.बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

जमलोकी भाई,बहुत ही नपा तुला और संतुलित काव्य.
बिजली
एक ध्योतक -उजाले का
जो रोशन कर दे जिंदगी
बिना जिसके लगती है जो
अधूरी
सच कहूँ तो मैं ख़ुद के लिए इसे एक नजीर की तरह ही मानूँगा.बधाई हो भाई जी
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

सीमा जी मैं आपके गजल कहने के अंदाज का शुरू से ही कायल रहा हूँ और ये भी सत्य है की आप मेरी प्रिय कवियित्रिओं मे से एक हैं पर इसबार आपने विषय कों संकुचित कर दिया.
यद्दपि की गजल पढने मे मस्त लगती है परन्तु दायरे की संकीर्णता खली.मैं आपसे और ज्यादा की उम्मीद कर रहा था.आप कों बुरा लगे तो माफ़ कीजिएगा परन्तु एकबार अच्छा प्रदर्शन करने के बाद आप पीछे नहीं भाग सकते.आपको उत्तरोत्तर आगे ही बढ़ना होता है,खैर्म, कुछ ज्यादा ही हो गया.
शुभकामनाओं सहित
आपका प्रशंसक
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

महक जी दिल खुश कर दिया आपने,आपके कविता से मिटटी की सोंधी महक निरंतर आती रही टैब भी जब मैं कविता ख़त्म कर चुका था.बधाई हों
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

शोभा जी मजाहिया अंदाज मे अच्छी कविता.बधाई हों
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

तन्हा भाई इसबार तो आपने डंका ही बजा दिया अपनी श्रेष्ठता का.अगर समीक्षा की बात की जाए तो मैं यही कह पाउँगा की-मस्त कवि द्वारा मस्त अंदाज मे मस्त कर देने वास्ते लिखी गई एक मस्त कविता.
नमन है आपको बड़े भाई,हिला दिया आपने तो....
सादर
आलोक सिंह "साहिल"

seema gupta का कहना है कि -

" साहिल जी निष्पक्ष होकर अपनी प्रतिक्रिया देने का दिल से शुक्रिया, कोशिश जारी है की मैं किसी को भी अपने लेखन से निराश ना करू, और इसमे बुरा लगने जैसी कोई बात नही है , तारीफ तो सभी कर सकतें है, लेकिन खामियों को बता कर अच्छा लिखने को प्रेरित करना एक अलग बात है , आपका दिल से शुक्रिया.
Regards

सजीव सारथी का कहना है कि -

कमल है भाई इतने अलग और हट कर चुने विषय पर भी कवियों ने जबरदस्त प्रस्तुति दी है, सभी को हार्दिक बधाई ये पंक्तियाँ बेहद यादगार रहेंगी
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?

sahil का कहना है कि -

विवेक जी अच्छे छायांकन के लिए बधाई.
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

राघव जी,आप भी खूब हैं,जिस कदर कविता से मन मोहते हैं उतनी ही अच्छी प्रतिक्रिया भी,आपकी तिप्पदी मे भी उतना ही खुमार है जितना की आपकी कविताओं मे होता है,बहुत अच्छे.
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

सीमा जी मुझे अत्यन्त खुशी है कि मेरी प्रतिक्रिया को आपने सकारात्मक तरीके से लिया.एक अच्छे साहित्यकार से ऐसी ही उम्मीद कि जा सकती है,बहुत बहुत साधुवाद.
आलोक सिंह "साहिल"

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- पंकज रामेन्दू मानव जी,
१)आपकी कविता पढ़ कर कभी ऐसा लगा जैसे आपने बिजली को हमारे जीवन से जोड़ने की कोशिश की और कभी ऐसा भी महसूस हुआ की जैसे.. शीर्षक से किसी तरह जोड़कर कविता लिखने की कोशिश. (ये मेरे व्यक्तिगत विचार है..मुझे जैसे पढ़ कर लगा.. वैसे कहना चाहा )
२)रूपक अलंकार का बहुत सुन्दर प्रयोग है..
जैसे "कहीं नाम का करंट, कहीं दाम का झटका है
कहीं वादे के एसी से जलता एक लट्टू लटका है
विकास के बांध से क्या बिजली बन पाएगी ?"
३) प्रस्तुतीकरण सुन्दर हो सकता था...
४) विराम चिह्न प्रयोग ठीक है.. शब्द चयन भी सुन्दर है
५) कुछ अलग सोच से लगी आपकी कविता..
बधाई हो...
सादर
शैलेश

sahil का कहना है कि -

अगर बात करें अपने पसंद कि कविताओं कि तो निश्चित तौर पर तो मैं आपका नाम लेना चाहूँगा-
गीता जी,तन्हा भाई,नंदन जी और अंत में सीमा जी,आप सबों ने बहुत ही बेहतरीन कविता करी.आप सबों को अलग से और दिल से बधाई.
उम्मीद है अगली बार इससे भी जोरदार पढने को मिलेगा.
आपका
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

बात करें सबसे कमजोर प्रस्तुति कि तो ये इन्तजार शायद इस माह पूर्ण होने से रहा.मुझे लगा कोई न कोई तो मेरे द्वारा रिक्त किए गए स्थान कि भरपाई करेगा ही,परन्तु मैं ग़लत था.
पुस्तक मेला में निमंत्रण सहित
आलोक सिंह "साहिल"

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

विपिन चौधरी जी
-आपकी कविता हमारे और बिजली के रिश्ते को जीती है..
- अछे मुक्तक का उदाहरण है
- भाव पक्ष-लक्षणा का अच्छा काव्य है...
- कविता और अच्छी हो सकती है.... प्रयास जारी रखे
-प्रस्तुतीकरण ठीक है पर विराम चिहन कम है..

सादर
शैलेश

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

गीता पंडित (शमा) ji
- बहुत अच्छा बन पडा है ..
- गाया जा सकता है
-शब्द चयन और प्रस्तुति कारन इतना सुन्दर है की.. जिज्ञासा बनी रहती है.. नयी पंक्ति पड़ने की.
- प्रसंग भी बहुत सुन्दर चुना है.. लगता है.. शीर्षक पर बहुत सुन्दर बैठती है कविता..
-प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएं,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,
मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |
मेरे पिया, अभी ना आये |
ये पंक्तिया बहुत अछ्ची लगी...
आपकी कविता इस गुलदस्ते के सबसे अच्छी कविताओ मै से एक है..
बधाई
सादर
शैलेश

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी.
- पहले आप मुझे तीरगी की मतलब बताएं
- आपकी कविता मुझे शीर्षक तो हट कर लगी...पर अच्छी थी,,,
-अच्छी संकल्पना और भावो को ले कर आई है आपकी कविता..
बधाई.
सादर
शैलेश

Amit Verma का कहना है कि -

yet another sitter Seema, great going .. all the best :)

- Amit Verma

दिवाकर मिश्र का कहना है कि -

राघव जी ! आपने टिप्पणी क्या लिखी कि जिनपर टिप्पणी लिखी है उन्हें ही मात देते से लग रहे हैं । क्या सुन्दर कविता है और शीर्षक को कितनी अच्छी तरह से जी रही है । अच्छी रचना के लिए बधाई ।

दिवाकर मिश्र का कहना है कि -

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