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Wednesday, March 28, 2007

ऐ तथाकथित सर्वशक्तिमान


हे ईश्वर महान,
हे सर्वशक्तिमान,
हे जगत पिता समान,
हे महादयावान।
आज लड़ती हैं तेरी सन्तानें आपस में लेकर झण्डे धर्मों के और साथ में हैं तलवारें भी।
एक दूसरे के लहू के प्यासे।
क्या देख रहा है तू?
कैसे देख पा रहा है तू?
कैसा पिता है तू?
धन्य है तू और तेरी महानता।
एक सोता है महल में,
दूसरे को नसीब नहीं एक साधारण मकान।
एक की बेटी की शादी में खर्च हों पैसे इतने कि हों जायें शादियाँ हज़ारों की।
दूसरे को बेचना पड़े अपना खेत और गिरवी रखना पड़े अपना घर।
कैसी है तेरी दया?
कैसा पिता है तू?
हर तरफ हो रहा है शोषण मनुष्यों का मनुष्यों द्वारा,
कहीं शारीरिक,
कहीं मानसिक,
कहीं आध्यात्मिक,
और पता नहीं कितनों तरह का।
पुकार रहे हैं तेरे पुत्र तुझे।
क्यों नहीं सुन पा रहा है तू?
कहीं भूकम्प,
कहीं त्सुनामी,
कहीं सूखा,
कहीं बाढ़।
क्यों खेलता है ऐसे खेल?
ऐ सबसे बडे खिलाड़ी,
क्या आता है तुझे आनन्द इसमें?
कैसे निर्दयी खेल खेलता है तू?
कैसा न्याय है तेरा?
कैसा पिता है तू?
नहीं, तू नहीं हो सकता जगत पिता।
पिता कभी नहीं देख सकता अपनी सन्तानों को एक दूसरे का खून पीते हुए।
नहीं हो सकता तू दयावान, जबकि हज़ारों हैं बेघर।
कैसे हो सकता है तू सर्वशक्तिमान जबकि नियन्त्रण ही नहीं तेरा तेरी ही स्रष्टि पर।
तू नहीं है न्यायप्रिय , तू तो खून की होली खेलता है बेवजह।
तू लाशों को देख कर खुश होता है।
मज़े लेता है भूखों को मरते देख कर।
तू नहीं हो सकता महान।
बिल्कुल नहीं हो सकता महान।
मुझे दुःख है कि तू नहीं है महान ,
ऐ तथाकथित सर्वशक्तिमान।

पंकज तिवारी

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

ghughutibasuti का कहना है कि -

बिल्कुल ठीक लिखा आपने। कितनों के मन में उठते प्रश्न आपने उठाएं हैं। मैं आपसे सहमत हूँ।
घुघूती बासूती

Anonymous का कहना है कि -

Close to my heart. Actually, this is the dynamism of god. If we know this chakra then what will remain the difference between we and god.

Srijan Shilpi का कहना है कि -

फरियाद बिल्कुल जायज है, दोस्त! 'गर कर सको तो थोड़ा और धीरज रखो और चिर-प्रतीक्षित की आहट सुनने की कोशिश करो और हो सके तो हाथ बँटाओ उसके स्वागत में।

विश्व दीपक का कहना है कि -

अच्छे प्रश्न किये हैं आपने। परंतु इनका उत्तर क्या किसी के पास है। शायद भगवान के पास या नहीं भी , परंतु उसके द्वारा गढे जाने के कारण हमारा हक बनता है कि हम उसपर प्रश्नों की प्रत्यंचा तान सकें।

रंजू भाटिया का कहना है कि -

एक सच और दिल के कई बार उठते सवालो को बख़ूबी लिखा है आपने

ऐ सबसे बडे खिलाड़ी,
क्या आता है तुझे आनन्द इसमें?
कैसे निर्दयी खेल खेलता है तू?
कैसा न्याय है तेरा?
कैसा पिता है तू?
नहीं, तू नहीं हो सकता जगत पिता।
पिता कभी नहीं देख सकता अपनी सन्तानों को एक दूसरे का खून पीते हुए।
नहीं हो सकता तू दयावान, जबकि हज़ारों हैं बेघर।
कैसे हो सकता है तू सर्वशक्तिमान जबकि नियन्त्रण ही नहीं तेरा तेरी ही स्रष्टि पर।

कौन जवाब देगा इन सब बातो का .. ..

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर कविता पंकज जी, बहुत गंभीर सवाल।

तू लाशों को देख कर खुश होता है।
मज़े लेता है भूखों को मरते देख कर।
तू नहीं हो सकता महान।
बिल्कुल नहीं हो सकता महान।
मुझे दुःख है कि तू नहीं है महान ,
ऐ तथाकथित सर्वशक्तिमान।

पढते ही मन प्रसन्न हो गया। पुनः कहूंगा सुन्दर रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

SahityaShilpi का कहना है कि -

अच्छी रचना है। मौजूदा माहौल को देखकर कभी कभी ऐसे प्रश्न मन में उठते रहते हैं।

Anonymous का कहना है कि -

khuda se aache sawaal kiye hain...aise sawaalon ka jawaab jaane hum kab khoj paayenge...kalyug main aate aate badi der laga raha hai vo aur manavta khandit hoti jaa rahi hai..
aachi rachna hai yah.

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