जोगीरा सा रा रारा......
होली मनाने के अपने-अपने अंदाज़ हैं.....उत्तर भारत में जोगीरा गाने का चलन है.....हर छंद के बाद आप भी कहिये जोगीरा सा रा रारा और फ़िर देखिये होली का मज़ा
एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,
और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव....
ना पानी, ना सड़क की, कोई करता बात,
हर नेता है पूछता, किसकी क्या है जात...
बाप दरोगा हो गए, बेटे हैं रंगदार,
माँ दुखियारी रो रही, हो बेबस, लाचार...
जब चाहा तब रात हो, पलक झपकते भोर,
क्या रखा है गाँव में, चलो शहर की ओर ...
कर धुएँ का नाश्ता, झटपट हों तैयार,
गए पड़ोस के भोज में, लेकर अपनी कार...
आँगन मेरे गाँव का, शहरी फ्लैट से बीस,
तिलक बराबर हो गई, पहली क्लास की फीस...
घर की मुर्गी दाल है, ऐसी अपनी सोच,
सौ करोड़ के देश में, रखें विदेश कोच...
दिल्ली आकर खो गए, शब्द , भावना, गीत,
त्योहारों पर कभी-कभी, याद आए मनमीत...
जोगीरा सा रा रा रा.....(अगले हफ्ते भी खेलेंगे होली....)
निखिल आनंद गिरि








































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15 पाठकों का कहना है :
निखिल जी हमेशा की तरह मस्त कर दिया आपने |
बहुत खूब... यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आईं
"एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,
और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव"
जोगीरा सा रा रारा.....
किसी दिन मंडली बना कर बैठते हैं और मिल कर गाते हैं इसे.....
वाह! कमाल के दोहे है निखिल जी आज कल दोहे बहुत कम लिखे जा रहे हैं ऐसे मे आप्की कलम से निकले इन दोहों को पड्कर मज़ा आ गया
भाई वाह ...... सा रा रा रा, सा रा रा रा, सा रा रा रा, हो जोगीरा सा रा रा रा. मज़ा आ गया.
बहुत सुंदर
भई वाह...........
वाह निखिल जी आपने तो कमाल का लिखा है
हर पंक्ति , शब्द बोलता है
पसंद आया आजकल की समस्याओं का बखूबी वर्णन
किया है आपने
बधाई
'आँगन मेरे गाँव का, शहरी फ्लैट से बीस,
तिलक बराबर हो गई, पहली क्लास की फीस'
बहुत खूब अंदाज़ हैं !
सुंदर!
मजा आ गया निखिल भाई।
अति सुंदर व्यंग्यात्मक कविता ,हम टू आपके साथ मलकर यही कह सकते है
जोगीरा सा रा रारा
जोगीरा सा रा रारा ......सीमा सचदेव
सौ करोड़ के देश में, रखें विदेश कोच...दिल्ली आकर खो गए, शब्द , भावना, गीत,
त्योहारों पर कभी-कभी, याद आए मनमीत...जोगीरा सा रा रा रा.....
वाह क्या खूब ...!व्यंगात्मक दोहे ...!मजा आ गया ..
"जोगीरा सा रा रा रा....." तुम्हारे व्यंग्य की धार पैनी है। तुम्हारी अपार क्षमताओं के अनुरूप रचना..
*** राजीव रंजन प्रसाद
एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,
और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव....
वाह निखिल जी वाह...बहुत खूब लिखा है आप ने.
दुष्यंत जी का एक शेर याद आ गया:
"कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए
यहाँ चिराग मय्यसर नहीं शहर के लिए "
आप की पूरी रचना ही समसामयिक है और सूचने को मजबूर करती है. ऐसे विलक्षण रचना के लिए बधाई.
नीरज
बहुत बढिया...
डा. रमा द्विवेदी said...
समकालीन यथार्थ की सुन्दर अभिव्यक्ति.....बधाई..
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